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एक सफर ऐसा भी



"आपका नाम भैया?"

"अर्जुन, अर्जुन बछानिया। मन्नू, पिताजी मेरा।"

"मेरा नाम मिलिंद है, ये संदीप भैया हैं।"

"जी।"

"नमस्कार।"

"तो अ... कैसे बताऊ..."




"आपकी कहानी मतलब बहुत अ... वैसी लगी - "

"सर, इतनी दरियादिल कहानी है हमारी तो - "

"हाँ, वही - "

"कि आप सुनो, तो आपको आँसू आजाये हमारी कहानी पे, ऐसा बीता है हमारे साथ में।"





"मैं पहली बार गया वहाँ पे, महाराष्ट्र। जी सर?"

"तो महाराष्ट्र में क्या हुआ?

"महाराष्ट्र में सर हमारी आठ दिन तो मशीन चली नहीं। उसके बाद में, फिर हम गए… कौनसा गाँव थो?"

"पापल के आस-पास थो।"

"पापल। पापल गए थे हम। लाल तुअर निकाली सर वहाँ पे।"

"उसके बाद आप वापिस यहाँ - ?"

"हाँ, रिटर्न आ गए सर। फिर वही किसान ने, जैसे - जिसकी मशीन पे गए न सर हम, उसने - "

"वो कहाँ के थे?"

"वो... राजस्थान का था, अलवर जिले का। उनको पसंद आ गया कि हम छह लोग थे, तो उनको पसंद कि अच्छा काम करते हैं। तो उन्ने हमको फिर तब बोला कि अब... हरियाणा और राजस्थान जाना है। हैना? तो हमने सोचा कि पचीस - तीस हज़ार ले आएंगे सर। तो… एक तो मजबूर आदमी, और लालच। हैना? ये दो ही साथ में चले हैं। क्योंकि लालच ऐसा कि यहाँ तो दो सौ की पड़ रही है धाड़की, वहाँ चार सौ मिल रहे हैं, तो चार सौ पूर रही है न वो। जबकि खाना - पीना उनका, अपने तो सूखा बच रहे है न चार सौ रुपये। तो वो लालच में हम सर वहाँ चले गए।"




"हमको यहाँ से वो आया, लेने। उसने... हमने उनसे पहले बोल दिया कि हमको पाँच - पाँच हज़ार रूपये चाहिए। एडवांस में दे गए हमको, छह आदमी थे, तीस हज़ार रुपये दे गए। खर्चा - पानी उसका लगता है इधर से, जाने में। तो यहाँ से हम गए और हम जैसे - तैसे हरदा पहुँच गए सर। हरदा पहुँचे हम नौ बजे रात के, ग्यारह बजे की ट्रेन थी वहाँ पे। फिर खाना - वाना खाया सर वहाँ पे। खाना खाके हम ग्यारह बजे की ट्रेन पकड़ी और फिर हम.. वहाँ चल दिए, जयपुर के लिए - "

"अलवर या जयपुर?"

"नहीं अलवर गए - पहले तो जयपुर गए सर। स्टेशन पे उतरे, उसके बाद में फिर.. अलवर गए हम।"

"तो तब तक लॉकडाउन लग गया था?"

"नहीं लगा था सर। जब हम जयपुर गए, तब लगा वो लॉकडाउन - "




"वहाँ से मुंडा बांधना चालू हो गया - "

"मुंडा बांधना। तो मैंने कहा यार, ये कई बीमारी है यार। अपुन पहले, हमारा ज़माना में - मतलब हमारा बाप - दादा का ज़माना में यह मुक्सा.. बैल होन को लगता था, जो अब इंसान को लग रहा है। है नी? तो हम बड़ा आश्चर्य में रहे। हम उतरे और हमारी जाँच करी उनने। फिर हमको वहाँ से... उन्ने कहा कि एक - एक मास्क खरीदो। तो तीस रुपये में एक मास्क मिला हमको। वहाँ से निकले सर, अलवर जिला गए, तो... जबरदस्त... अ... लॉकडाउन लग गया था वहाँ पे, जबरदस्त। इधर से उधर न कोई जा सके। तो दाड़ी - मूछ बड़ गयी थी इनकी, मेरी भी थी। ऐसा तो, एक गाँव में हमने कटिंग कराई।

तो कटिंग वाले ने लालच में कर दी। पचास रुपये… कटिंग का - दाड़ी का। कटिंग नहीं, दाड़ी - दाड़ी का पचास रुपये। तो कितने… तीन आदमी ने कराया, एक तो तमने अने इकी तो आधी रह ही गयी थी, और गाँव वाले लठ लेकर आ गए। वो नाई से कहे वो कि कोरोना चल रिया है और तू अंजान आदमी की कटिंग कर रिया है। मरेगा क्या? और नी तो दूकान बंद करो यहाँ से। तो मैंने कहा मारो मत, हम तो जई रिया है भैया, एक जैसे-तैसे आधा बाल छोड़िया, आधा करिया, वहाँ से चले हम।"






"तो... "

"अच्छा तो पैदल गए आप?"

"नहीं - नहीं, ट्रेक्टर था सर। मशीन पे ही।"

"अच्छा सेठ का ही?"

"हाँ, सेठ का ही ट्रेक्टर था-"

"तो ये हार्वेस्टिंग-"

"हाँ, हाँ। हड़म्बा बोले सर उसको।"

"हड़म्बा?"

"हाँ।"

"तो आप कितने लोग थे?"

"हम सर…"

"ओ सेठ सुद्धम साथ जाने थे - "

"सात थे हम।"

"ओके।"

"वहाँ से चल दिया, फिर पाछा। वहाँ आयी गया, जहाँ पेट्रोल… अपन फिर रात भर वहीं रिया, पेट्रोल पंप पे। तो जो हमारा सेठ था, वो कंजूस था। मतलब लालच। यार चलो वहाँ बीता तो बीता, आगे ऐसा थोड़ी नी होगा। तो हमको दो बजे रात से, वहाँ से पेट्रोल पंप से निकाल दिया।

तो... फिर हम... तालरोड ज़िला में पहुँच गए, हरियाणा की बॉर्डर कूद गए सर वहाँ पे। हरियाणा बॉर्डर कूद गए सर, तो वहाँ हम पाँच बजे पहुँच गया होगा नी?"

"हाँ।"

"और देखे तो, पाँच आदमी इधर से आ रहे हैं लठ लेके, पाँच आदमी तलवार - बन्दूक लेके इधर से आ रहे हैं, पाँच इधर से आ रहे हैं। मतलब हमको ऐसा घेर लिया जैसे की रामायण - महाभारत में युद्ध होये न? ऐसा सब तरफ से घेर लिया हमारे ट्रेक्टर को। मैंने कहा आज तो मरे तो मरे अर्जुन, अब तो गए। लॉकडाउन चल रहा है जबकि वो केस हो गया था, कहाँ का सर वो महाराज को मारा था, महाराष्ट्र में, किडनी निकालने वाला है। वो टाइम पे हम वहाँ हरियाणा थे। मैंने कहा उनकी जैसी मौत हुई न? वैसी मौत अपनी भी होने वाली है। ये तो तय है, फाइनल है।

तो वो एक पत्रकार था सर उसमें, वो तो सब मालिक के ऊपर है - हाथ में, अपने हाथ में तो कुछ नी है। पत्रकार ने - नहीं - नहीं, हाथ भी मत लगाना इसको। इनको एक काम करो कि थाने पे ले चलो। तो सर हमको उन्ने - पत्रकार ने हमको थाने पे ले गया।

तो... रात का समय था, पाँच... साड़े पाँच कि बात थी - "

"सुबह - सुबह?"

"सुबह - सुबह। तो एक पुलिस वाला आया, उसने पूछा आप कहाँ से आये। तो... अपुन तो भोला लोग, देहायती लोग हैं, तो सर मैंने कहा कि हम एम.पी. से आ रहे हैं। और ट्रेक्टर कौनसा - कहाँ का है? तो मैंने कहा ये वहाँ का है, राजस्थान का।"

"तो आपके साथ सेठ भी थे तब?"

"हाँ, सेठ भी थे, सेठ भी था सर। पर सेठ तो इत्ता…"

"सीधा जो बोले भी नहीं - "

"बोलो ही मत तम तो कि सेठ था वो। मौसम नाम था उनका। तो मौसम से पूछा पहले तो - आप कहाँ से आये हो? तो उन्ने कहे हम मालेरी... राजस्थान, अलवर जिला, दादर के रहने वाले हैं। अच्छा, और ये मजदूर कहाँ से लाये? ये मजदूर हमने एम.पी. से लाये। क्या आपको मालूम कि पचीस अप्रेल को लॉकडाउन लग गया, तो फिर आपको नहीं आना था। और आ भी गए ये, तो आपके घर ही रखना था। इधर आगे क्यों बड़ रहे हो तुम? तो सर मजबूरी हैगी। हैना? तो तीन लठ तो उसको पड़े। ठीक है? फिर, उसके बाद में मैं मुखिया था, एक लठ मेरे को पड़ा। जबकि मैं तो ओ करदा मैंने। अब हमारे में गोश्त ही नहीं है, तो आ नहीं करू तो और कई करू? एक लठ मेरे को पड़यो। इनको भी पड़ा, इनको भी पड़ा, सबको पड़ा वहाँ। वहाँ तो कोई ऐसी रहम - सक्ती है ही नहीं।

वहाँ से फिर सर सुबह - सुबह फिर एस.डी.एम., एस.पी., ये आये। तो उन्ने बोला कि आप कैसे आये?

मैंने कहा सर मजदूरी करने आये हैं हम तो और गरीब लोग हैं, लॉकडाउन लगा उसके पहले हम यहाँ आ गए। और फिर अब जाएँ , तो कैसे जाएँ ? पैसे हो तो जाएँ। तो कैसे... मतलब किसान... सेठ नहीं दे रहे? तो मैंने कहा उनके पास ही नहीं है तो कैसे देगा? मशीन चलेगा तो देगा भी, नहीं तो कहाँ से देगा? है? चलो कोई बात नहीं है।

फिर वहाँ से उन्होंने एक रूल बना लिया कि.. जो मजदूर - किसान हार्वेस्टर पे है उनको परेशान मत करना। तालरोड पे यो नियम बना लिया। फिर हमारे उन्ने कोई तकलीफ नहीं दी।"







"फिर एक और नेता मिल गया सर वहाँ पे, जो हमको दो ट्राली गेहूं, फ्री में निकलायो उन्ने। है नी? निकाल्या था नी उकी?

थाने से गया उसने, कि यह थाने वाले हमारे पहचान वाले हैं और इसके... थानदार था, हैडसाब था सर वो हमको नहीं मालूम, उसने कहा कि तुम कर लेना यार आपस में, और ले जाओ तुम।"

"घुग्गु को लेजाओ।"

"हाँ, इनको लेजाओ घुग्गु - उधर मतलब मशीन को घुग्गु बोले उधर। तो कहे मशीन लेजाओ। नहीं जाए तो अब - पहले तो हमने पुलिस के लठ खाएल थे सर। तो डर के मारे कई मालूम ये तो... वे है... है नी पुलिसवाला, तो छोड़ दे, या नी दादा का आदमी है। तो शाम चार बजे तक काम करायो उसने। सुबह से पाँच बजे चले गया - आठ... नौ बजे चले गया होगा अपन वहाँ। है? तो एक टाइम रोटी खाई अपन।"

"और कितने दिनों तक करवाया?"

"नहीं एक ही टाइम।"

"अच्छा, एक दिन।"

"एक दिन। एक दिन में हमने दो ट्राली गेहूं निकाला है। वहाँ से सर, हमको चार बजे विदा कर दिया उसने। फिर सर हम वहाँ से, सदर थाना में पाली करके गाँव है। उसमें हमने काम करा। तो जो हमारा एक... जो हमारा सेठ का दलाल था, वो क्या करता सर कि अपने इधर तो... अ... दो बीघा या तीन बीघा का अपन बीघा ही माना या... एकड़ माना, उधर दो बीघा को एक किलो बोले। जैसे ये खेत है, आप... आप... आप हम क्या बोलते हैं इसको - बीघा! है ना? उधर किलो बोले इसको। तो सर वो क्या करता है, हमने अगर तीन किलो निकाला है, तो वो हमको दो किलो का पैसा दे। एक किलो का पैसा वही खा जाए। मतलब हमारा पेट मारे वो, जो... वहाँ का दलाल था, वो। तो ऐसे हमने कम - से - कम, कई जिले कूद गए सर हम तो। क्योंकि हम तीन महीने उधर ही रिये - हरियाणा और... राजस्थान में, उधर ही रिये। और उसके बाद में हमने काम भी केवल... एक महीना करा। ये तो लॉकडाउन में काम चलने ही नहीं दिया। फिर उसके बाद में रिटर्न आये हम। पूरा सीजन हो गया हमारा, पूरा सीजन तो हुआ नहीं, पर वहाँ से रिटर्न हो गए सर हम।"





"तो टोटल कमाई कितनी हुई थी?"

"एक - एक आदमी को पाँच - पाँच हज़ार। अब उसके बाद में रिटर्न आये, तो उधर का काम.. जो सेठ था, उनका देने - लेने का नहीं था सर। वो जो हमारे पास पाँच हज़ार बचे न? उसमें से ही खर्चा करो।"

"अच्छा।"

"हाँ, आप बीड़ी लो या सिगरेट लो, तो आपका खर्चा वो। उनका काम है इधर से जाओगा, वो खर्चा है उनका। उधर से आपका खर्चा है।

तो सर... वहाँ गए आये, हरियाणा बॉर्डर ख़तम, उसके बाद में राजस्थान बॉर्डर लग गयी। राजस्थान बॉर्डर लग गयी, उसके बाद में फिर राजस्थान की पुलिस ने रोकिआ हमको। फिर हमारा अ... मशीन से जाँच करी कि कोरोनो है कि नहीं है। तो सर हमारे हाथ पे, यहाँ... कुछ लगाया उन्ने, मोहर लगायी - सील राजस्थान की। तो उसके बाद में पूछा आपको... खाने को मिला कि नहीं मिला? अरे मैंने कहा कि सर, तीन दिन हुई गया हमको कहाँ खाने को मिलयो यार। तो फिर हमारे उन्ने एक - एक पैकेट दिया हमारे खाने के लिए - आलू की सब्जी और पाँच पूड़ी। ये दिया सर हमको।

तो एक ये ऐसा केस आ गया था वहाँ पे अ... कोरोना वाला। तो जो हमारा सेठ था, वो कहे चलो जल्दी नहीं तो और कही - न - कही अपना से गलती हो जाएगा। नहीं तो और अपना को... पीछे यहाँ रोक लेगा। तो हमने कोई ने खाया, कोई ने नहीं खाया और सर हम वहाँ से चल दिए।"






"तो उसके बाद हम... अलवर आ गए, तो अलवर दो दिन रहे। और वहाँ से हमको तहसीलदार और... आंगनवाड़ी की मेडम और... थाने से पुलिस, ये हमको ढूंढ रही।"

"फिर मिले। फिर चौदह दिन का हमको कह दिए - "

"चौदह दिन रोक दिया?"

"हाँ, चौदह दिन हमको एक - उनको एक कमरा था अलग, सेफ। उसमें हमको एक तरफ रखे। अ... उसके बाद में हमको चौदह दिन क्वारांडाउन वहाँ करा सर हमने। तो फिर हमको... वहाँ पे आंगनवाड़ी से - हमको मिला भी सर वहाँ पे। पाँच किलो आटा, एक किलो दाल, दो साबुन, अ.. पाँच पार्लेजी और.. अगरबत्ती, शैम्पू, ये सब दिए सर वहाँ पे। तो सर फिर उसके बाद हम एक महीने... चौदह दिन नी अपन तो कम - से - कम एक - डेढ़ महीने रहिये। डेढ़ महीना रहा हम सर। तो किसान ने भी हमको अच्छी मदद करियो उसने।"





"ये वही था मौसम या फिर?"

"अ... मौसम।"

"मौसम?"

"मौसम। अच्छा आदमी मिला हमको। उसके बाद में उसकी तरफ से उनने कम - से - कम हमको पचास - एक किलो आटा खिला दिया। और काम भी करिया हमने। हैना? अब जो - मानलो कि जो हमारी घर की जो कमा के लाये, वो पूँजी ख़तम हो जाए और डेढ़ महीनो वहाँ रहे, तो फिर क्या करेंगे?"

"तो मौसम जो सेठ था आपका, उन्होंने फिर काम भी करवाया।"

"जी। उसने नी करवाया। उन्ने केवल काम दिलवाया हमको। उसके बाद में वहाँ से रजिस्ट्रेशन करवाया। रजिस्ट्रेशन करवाने के बाद में - "

"किस चीज़ का रजिस्ट्रेशन?"

"सर यहाँ आने के लिए।"

"अच्छा। तो कैसे आने? ट्रेन वगैरह - ?"

"हाँ, ट्रेन से बात हुई थी सर। जैसे वो... प्रचार हो रया था कि... शिवराज सिंह... लेने को आ रहा है। हैना? और अशोक गेहलोत वहाँ पहुँचा रहा है सर। प्रॉब्लम ये थी कि हमने जब रजिस्ट्रेशन करवा दिए तो वो कहे कि नी, थाने से जाओ, थाने से लिखित में लाओ। तो आपको अ... वहाँ से अ... रजिस्ट्रेशन होगा आपका। तो... हम फिर थाने पे गए। थाने पे गए तो हमारी कोई बात नी सुने वहाँ। तो वापिस आ गए हम। तो ऐसे ही पाँच - पचीस आदमी जा रहे थे, निकल के, छोरा - छोरी वाले, जैसा हमारे जैसे मजदूर। तो मैंने बोलै मैंने कहा भाई ये हमारे गाँव के ही हैं यार, और हम तो आज जाएँगे ही सही। हम वहाँ से झूठ बोलके निकल गए, तो... वहाँ से खूब से हम गया होगा बीस - पचीस किलोमीटर पैदल। कम से कम - "

"तो अलवर से आप लोग चलना शुरू कर दिए?"

"हाँ, पैदल कर दिया सर हमने वहाँ से चलना हमने।"






"उसके बाद में एक ट्रेक्टर मिला, ट्राली मिली। फिर कोई - कोई दयावान मिल भी जाएँ आपके जैसे, तो हमको छाछ भी दिए। किसी ने चार बॉटल छाछ दिया हमको, कोई मिला तो उसने हमको पाँच पार्लेजी भी दिए। मतलब जैसे - जैसे बढ़ते गए, वैसे - वैसे। हर आदमी एक ऊँगली के - पाँच ऊँगली बराबर नहीं है सर। हैना? तो हमारे साथ में कोई ने दुर्व्यवहार भी करा, कोई ने शिष्टाचार भी करा - ऐसी बात नहीं है, तो... पर वो परेशानी तो आयी सर हमको। तो वहाँ से चले हम, तो हमको गाँव में... पानी न पीने दे, कोरोना की वजह से। अपना को याद है वो टंकी पे? ए भैया! हाथ मत लगाना इसमें। आगे जाओ, आगे। तो नाला का पानी पिया सर हमने। वो क्या मालूम कैसा है, वो तो मालिक जाने।"

"तो खाने - पीने का क्या - ?"

"खाने - पीने का, जो बिस्किट थी वो, वो बिस्किट को हमने दो दिन तक पुराया है। क्या बताये सर वो तो... हमारी बीत गयी और बात याद रह गयी वो तो। हैना? फिर वहाँ से चले सर, फिर आगे गए। तो कोई गाली दे हमको - पुलिसवाला, कोई अ... अच्छा भी बोले। कोई कहे नहीं - नहीं यार, बहुत दूर से आये ये लोग, एम.पी. के रहने वाले हैं और फस गए बाफड़े, तो इनको निकालो यार। तो हमको एक ट्रोला में बैठाया उन्ने और कहे... हमारे को पुलिसवाला कहे कि ऊपर मत होइजो, मुंडी भी नहीं दिखनू चाहिए। तो यूँ लेट के आया हम। अब नीचे यूँ तपेल - चद्दर, ऊपर धूप पड़ रही है, और... कहीं छाओ भी नहीं। तो धमक, एक डर, तो ऐसा पड़े - पड़े के आया हम। बॉटल भरी पानी की तो यूँ पियाँ, उठ... उठके ऐसा नहीं कर सकां। कई मालूम काये की जगह क्यों... कौन रोकले। तो सर! हम... वो गाड़ी नू अनुब... वास्तव में वो ड्राइवर के... तारीफ करना पड़ेगा, उन्ने हमके... कम - से - कम पंद्रह - सोलह सौ किलोमीटर, बैठाया उन्ने और उन्ने हमारे वहाँ छोड़ दियो भैया कि भैया यहाँ तक साथ मेरे - "

"कहाँ पे?"

"मूंदी है न, मूंदी के - "

"हाँ, मूंदी में - "

"कोटा से उधर है आगे मूंदी - "

"कोटा से आगे - "

"राजस्थान में - ?"

"राजस्थान की बात है, मूंदी की बात है। वहाँ पे, उन्ने छोड़ दिया और उन्होंने रस्ता बता दिया, ये रस्ता चले जाना। तो सर फिर वहाँ पे.. हम उतरे। अब खाने - पीने का तो कुछ है ही नहीं हमारे पास। तो… रात का बारह बजी गया और सोनू कहाँ? सोना का रोल ये हैं ही नहीं। तो सर मूंदी में ही - या मूंदी या कोटा में एक गुफा पड़े जो कम - से - कम दस किलोमीटर - "

"गुफा ही गुफा है - "

"भीतर ही भीतर रोड है उको। भीतर, अंदर से, बाईपास बनेले वो। तो वो रोड लगा हमे। वहाँ गया, तो जाते - जाते हमारे चार बजी गया। है नी?"

"ये पैदल आप चल रहे थे?"

"पैदल सर। वहाँ से हम कम - से - कम... चली गया होगा दो - एक सौ किलोमीटर चली गया होगा तीन दिन में अपन, है नी?"

"तो और भी लोग चल रहे थे आपके साथ?"

"यूँ तो"

"आगे - पीछे हो जाए यूँ तो बहुत से लोग मिले हैं - "

"सर बहुत - इतने लोग मिले कि अकल काम नहीं करे सर। पर वो बात अ... जैसे आप दो... आदमी हैं तो दो तुम्हारे हिसाब से चल रहे हैं, हम हमारे हिसाब से चल रहे हैं, सब अपनी - अपनी... टीम से चल रहे हैं। ऐसी - ऐसी हालत थी सर कि उनको देखे जाए, तो आपको ही आँसू आजाये। एक हाथ में तो छोरा - छोरी, य हाथ में बैग, है नी? और एक हाथ में और भी कई सामान। मैंने कहा यार कई जिंदगी है यार अपना लोग की तो, मर जानो अच्छा पुरे। वो कोरोना तो हमको आने थो, जो उनको आयी गए - जो बड़ा - बड़ा वी.आई.पी. लोग है नी, उनके। हमारा आनो थो वो, तो मर तो जाता, तो टेंशन ही ख़तम थो वो।"






"वहाँ से जैसे ही गुफा से हिटे सर हम, फिर एक... रे... बालू रेत का ट्रक मिला। तो उन्ने हमको रोका कि रुको - रुको। बोले कहाँ जाओगे तुम? मैंने कहा भैया हम एम.पी. के रहने वाले है यार। अरे यार बहुत दूर आ गए यार, तुम कैसे जाओगे यार? आपके पास कुछ है कि नहीं? सर हमारे पास तो मैंने कहा कुछ भी नहीं है, और जैसे - तैसे आ रहे हैं। तो... उन्ने फिर हमको एक - एक पार्लेजी दिया, चाय पिलाई। यहाँ से कम - से - कम पचास किलोमीटर - तो पचास किलोमीटर उन्होंने हमको बिठाया वहाँ की जगह - ऊपर, ट्रॉला पे, और वहाँ छोड़ दिया उन्होंने।"

"कहाँ पे?"

"कोटा।"

"हाँ, कोटा की बात है सर वो, वहाँ छोड़ दिया हमको। तो सर, उसके बाद में वहाँ से पैदल चले हम। तो वहाँ से कम - से - कम.. तीस-चालीस किलोमीटर चला होगा नी अपन?"

"हाँ।"

"फिर उसके बाद में... अब वहाँ से बॉर्डर रह गयी अपने यहाँ से कम - से - कम अ.. सतवास इत्ती दूर। तो जानू कैसे?"

"तो अब तक कितना चल चुके थे आप?"

"तो हम कम - से - कम चल गए थे वहाँ से चार सौ - पाँच सो किलोमीटर, पैदल में। और जो लॉरी ने, न बस ने, इनने जो छोड़ी वो अलग है। उसके बाद में, वहाँ से सर चले हम तो.. वहाँ से चालीस किलोमीटर। तो सभी आदमी एक जैसे नहीं रहते, वो बोल रहे है कि यार, कोई वाहन कर लो यार, कोई कए करलो। तो एक फिर - एक पिकअप करी फिर वहाँ से। तो उन्हें वहाँ लाने के लिए सत्तर रुपये और लिए। सत्तर रूपये लिया, फिर सत्तर रूपये के बाद में फिर पचास रुपये और दिया, जब बॉर्डर पे आये हम। तो रात के हमको कित्ता बजी गया था... छह - सात बजी गया था नी? झाँसी में आयाके। सात.. सात.. छह.. सात या छह बाजी गया हमारे। अब झाँसी... यु सुनया कि झाँसी की रानी को गाँव है वो तो पर अपन ने झाँसी देखया ही नहीं। और अपना ना देवास दिखे, न... इंदौर दिखे न भोपाल दिखे वहाँ की जगह। वहाँ कई नहीं दिखियो हमारे। अब अपना तो देश ही नहीं इधर। अब ये म्हारा साला है, ये पढ़े - लिखे नहीं है, ये भी पढ़े - लिखे नहीं है, यो म्हारा साला है। हम चार तो यही बेठिया, दो और हैं। हमारे साथ तो... मैंने कहा अभी तो कैसे जाएगा, अभी तो बुरी बात हैं। अपुन तो कोना पे आयी गया एम.पी. का और अपना से कई जवाय नहीं। तो वहाँ पे - "

"मतलब आपको पता ही नहीं था आप कहाँ पहुँच गए-"

"पता ही नहीं था, कहाँ पहुँच गया हम। जहाँ उतरने थो, वहाँ नहीं उतरया हम, दूसरी जगह उतर गए हम।"

"झाँसी उतर गए।"

"झाँसी उतर गए। फिर वहाँ से मैं फिर... बोर्ड पे देखयो। एक पुल थो, तो आधा लोग इधर जाई रिया, आधा इधर जाई रिया। एक रोड यु थो। फिर पुल के नीचे देखेयो तो वहाँ लिखेल थो... देवास। मैंने कहा यार यो रोड है यार देवास को।"

"और फिर ये जिओ के मोबाइल में पूछा।"

"जिओ का मोबिल था हमारे पास, उनसे पूछा। तो वो उल्टा - शुल्टा चले वो, पूछना में भी। ओका बाद में मैंने बोर्ड देखयो। बोर्ड देखने के बाद हम.. कम - से - कम पचास गाड़ी को हाथ दिया, हमारे से गाड़ी नी मिले हमारे। फिर एक वीडियो कोच गाड़ी मिली, वह भी ऐसी... हमारे जैसी - मतलब वी.आई.पी. लोग को छोड़ने वाली गाड़ी थी वो। हमारे जैसे क्या है कि बस के - हम तो ट्रक न ट्रैक्टर में लदा के आ रहा था। वह तो वीडियो कोच गाड़ी थी। तो फिर ऊको रोकिया हमने, ऊके रोकिया तो उससे पूछया भिया मैंने कहा कि वहाँ... मक्सी - तराना बाईपास पे... छोड़ने का कितना पैसे लेगा? तो उन्ने... एक सदस्य से कितने लिए - तीन सौ कि चार सौ?"

"चार सो लिए।"

"एक सदस्य से चार सौ रुपये लिए उन्ने, मक्सी - तराना का। फिर हम वहाँ से - दो बजे रात के वहाँ उतरे, तो हमको मक्सी - तराना पे रोड को सूझ नहीं पड़े। तो तीन राउंड तो उपे मारया हमने।"

"एक किलोमीटर चले जाए, वहाँ से पीछे आ जाए देख के।"

"क्या - क्या देखने जा रहे थे?"

"अरे सर... ये सूझ नहीं पड़े कि देवास जानो हैं कि इंदौर जानो हैं कि भोपाल जानो हैं। ये सूझ नहीं पड़ी रियो हमारे। तो हम चार राउंड मार दिए यहाँ से सुरमन्या... सुरमन्या इत्ती दूर। फिर मैंने देखा कि मैंने कहा यार अ... उधर से निकले, तो बाईपास के दो रोड होते है सर, एक ये क्रॉस कर और यस। तो मैंने इधर देखा तो मैंने कहा कि ये देवास रोड है यार, तो फिर यो रोड लगे सर हम। तो कित्ता बजी गया हमारे... देवास में आते - आते? ग्यारह बजी गया। हैना? दस-ग्यारह बजी गया होगा?"

"हम्म्म"

"पैदल!"

"पैदल आये?"

"पैदल। पैदल आये सर वहाँ से भी।"

"मक्सी - तराना से?"

"जी। फिर वहाँ से हमने घरवाले को फ़ोन लगाया। फिर यहाँ से देवास - ये लेट पहुँचे सर यहाँ से। फिर हमको वहाँ - देवास वाले... पुलिसवाले होन ने हमको वहाँ नास्ता - वास्ता कराया सर। नास्ता कराने के बाद में वो कहे अब चले जाओ तुम।"

"फिर वहाँ से घर?"

"फिर... ओका बाद में फिर मोटरसाइकिल... हमने बुला लए थे। तो... तीन.. तीन - चार किलोमीटर बाद में, हमारी गाड़ी आ गयी थी वहाँ पे। तो पाँच गाड़ी गयी थी हमको लेने के लिए। और हमारे घर वालो ने तो आस ही छोड़ दी थी - क्या मालूम, अब कहाँ से आएंगे वहाँ से? इतनी दूर से अवा रिया क्या?"

"तो वापिस जब आये फिर क्या हुआ?"

"सर यहाँ हम एक रात रहिये।"

"कहाँ पे?"

"हम तो सीधा हमारे घर ही आ गए थे, यहाँ पे, ठीक हैं? इसके बाद में ये... "

"चेकअप करने आये-"

"अस्पताल वाले, वो आ गए सर। दो गाड़ी आई हमको, नहा चेकअप करने। उन्ने बोला कि आप घर से बाहर रहोगे। फिर हम इसके बाद में चौदह दिन इस्कूल में रिये। जो खाने का चौदह दिन का राशन था, उसमें से... कुछ भी नहीं दिया उसने, सब घर से गया सर। ये हुआ सर हमारे साथ।"

"ये आपकी पत्नी हैं?"

"जी।"


"जीजी, घर पे कैसा था उस समय?"

"क्या हाल था? मैं धाड़की- धंधा करती सर। जो... गेहूं कटे - करते काम, गेहूं काटने जाते। ये काम करते - कभी मज़दूर चल जाती, चल जाती, नहीं तो घर पे रहते।"

"तो इनसे बातचीत होती रहती थी?"

"हाँ बातचीत तो करते थे हम फ़ोन पर। ये बता देते हम कि कहाँ जा रहे हैं आज कहा.. हम बताते कि वहाँ धड़की जाते है, वहाँ ऐसा, मज़दूरी जाते, करते, बात हो जाती शाम घड़ी हमारी।"

"तो टेंशन नहीं हुई आपको?"

"टेंशन तो अई सर। पर क्या करे टेंशन करना से? बहुत दूर था।"

"आसपास के लोग क्या बोल रहे थे?"

"क्या बोल रहे - वही बोल रहे, अब नहीं आएगा तुम्हारा पति कहे की। उनकी आस छोड़ दो कहे की। मैंने कहा कि मैं तो आस छोड़ू भी नहीं, वे तो आएगा घर, यू बोला मैंने तो। मैं नहीं छोड़ू मैंने कहा, वे तो आएगा घर वापस।"

"फिर आगे का क्या सोचा हैं?"

"आगे का सर, मजदूरी करनू है। के तो... वही लोग आये, राजस्थान का अन क महाराष्ट्र ले जाए। पैसा देगा, तो जाना ही पड़ेगा वो तो। अब एका बाद में... सोयाबीन काटने के बाद में यहाँ कोई काम है ही नहीं, अपने इधर। कई काम है इधर? कई भी नहीं। और महाराष्ट्र में दो महीना मशीन चलेगा। अगर लॉकडाउन बंद हुई गयो और न कई.. कंट्रोल नहीं हुइयो तो जानू ही पड़ेगा। ये बात है सर।"





Research: Manoj Singh Rathore and Ranjini Sen

Music: Harbola Folk Musicians

Paintings: Santanu Sen

Sound recording: Sandip Bhati

Concept, Sound design and Mixing: Milind Chhabra

Title drawing: Aajad Singh Khichi, Jyoti Garhewal Lasar, Sandip Bhati and Maya Janine

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