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जरीना दीदी

अपडेट करने की तारीख: 28 नव. 2020



मुझे बताया गया था कि जरीना दीदी सिरलाय में रहती हैं। मैं मेन रोड पर चलते हुए दाहिने ओर मुड़ती सकरी गली में घुस गई। तेज़ धूप थी, थोड़ी ही दूर एक घर की छाँव में जमीन से दो फुट उपर बने पक्के ओटले पर चार महिलाएँ सार कोड़ी का खेल खेल रहीं थीं। वहाँ पता चला कि गली की आखिरी छोर पर जो पुराना घर है वह जरीना दीदी का ही है। 



घर का दरवाजा बंद था। खटखटाने पर एक महिला बाहर आई। “जरीना दीदी हैं?” “अंदर हैं।” दरवाजे के उस पार एक लम्बा हाॅल था। इसके बीचों-बीच एक खम्बा था। चारों दीवारों से अलग-अलग चीजें सटी हुई थीं। एक पुराना कूलर, छोटा सा पलंग, पर्दे से ढका फ्रिज और खटिया पर सोया एक बूढ़ा आदमी। उस महिला ने मुझे पलंग पर बैठने को कहा और खुद, कमरे में चली गई। थोड़ी देर में उनके साथ, सर पर दुपट्टा डाले एक दूसरी दुबली-पतली महिला बाहर आईं। जरीना दीदी की सलवार की मोरी से पानी टपक रहा था। वे शायद पानी भर के ही आयीं थीं। खटिया पर सोये ससुरजी को देख, दीदी ने घूंघट कर लिया।   “नमस्ते दीदी, मेरा नाम वर्षा है। मैं कहानियाँ लिखती हूँ। मुझे किसी ने बताया-” “मेको आज जेठानी के साथ कहीं बाहर जाना है, आप कल आ जाना”। उन्होंने मेरी बात को काटते हुए अपनी धीमी आवाज में बोला।   जाते-जाते मेरी नजर कूलर के पीछे रखी एक काले रंग की सिलाई मशीन पर पड़ी। अगली बार जब मैं जरीना दीदी से मिलने गई तो वे मुझे घर के आंगन में उसी मशीन में तेल डालते हुए दिखीं। कड़ी धूप में काली मशीन चमक रही थी। “यह नई ली है क्या दीदी?” वे कुछ नहीं बोलीं। “क्या-क्या सिल लेती हो?” “ऐसे ही, थोड़ा बहुत।” “दीदी मुझे सूट सिलवाना है, सिल दोगी?” उन्होंने सिर ऊपर करके मुझे आराम से देखा। उनकी आँखों के नीचे गड्ढे थे। “हाव”, उन्होंने कहा। “आपने सिलाई करना कहाँ से सीखा?” वह कुछ सोचते हुए बोलीं, “जब मैं 12-13 साल की थी, मम्मी घर पर सिलाई मशीन चलाती थी, देखते-देखते सीख गई।”


जरीना दीदी का मायका, बड़वाह से 15 किलोमीटर दूर हनुमंतिया में है। दीदी अपने 5 भाई बहनों में बीच की थीं। उनको घर से बाहर नहीं जाने दिया जाता था। 15 साल की उम्र में उनकी शादी बड़वाह निवासी अफजल खान से कर दी गई। अफजल खान अपने 5 भाइयों में सबसे छोटे थे और अपने बड़े भाई के साथ इन्दौर रोड, बड़वाह में अपने खुद के गेराज में काम करते थे। दोनों भाइयों का सयुक्त परिवार था और माता-पिता भी साथ ही रहते थें। जरीना दीदी को शादी में अपने पिता से कई तरह के सामानों के साथ-साथ हाथ से चलाने वाली सिलाई मशीन भी मिली। उनके तीन बच्चे हुए, एक लड़का और दो लड़कियांँ। घर के काम और बच्चों की परवरिश करने के साथ-साथ वे फटे-पुराने कपड़े भी सिल लिया करती थीं। कुछ सालों बाद अफजल भइया की तबियत कुछ खराब होना शुरू हो गई। इस वजह से गेराज की रोज की कमाई से काफी पैसे दवाइयों में लग जाते थे। इसको लेकर घर में पैसों की खींचतान होने लगी। जरीना दीदी ने एक बार अपने पति से पूछा, “मैं बाहर की सिलाई लेना शुरू करूँ क्या? घर की कुछ मदद हो सके।” “अरे! तुम काम करोगी तो बच्चों को कौन सम्भालेगा?”


मुझे इतना बताकर जरीना दीदी वापस सिलाई मशीन में तेल डालने लगीं। मैं थोड़ी देर उन्हें देखती रही, फिर वापस अपने घर की ओर चल दी।

कुछ दिन बाद मैं फिर उनके घर गई। जरीना दीदी अंदर के दरवाजे के पास मेरी तरफ पीठ करके पोछा लगा रही थीं। मैंने थोड़ी देर कुछ नहीं कहा। “अरे दीदी! नमस्ते।” मुझे देखकर उन्होंने अपना काम छोड़ दिया। “आवो। कैसे आना हुआ?” उन्होंने मुझे पलंग पर बैठाया और खुद खम्बे का टेका लेकर बैठ गईं। फिर हम दोनो बाते करने लग गये।   11 साल पहले, एक दिन गेराज से शाम के समय घर लोटते हुए अफजल भइया ने देखा कि कुछ लोग भीड़ लगाये खड़े थे। एक महिला सब को समझा रहीं थी, “आप 15-20 महिलाएँ समूह से जुड़ जाओ। हर महीने बचत करना, समूह से जब लोन लोगी तो ब्याज भी कम लगेगा।”

अफजल भइया ने देखा कि वहाँ उनकी तारानगर वाली भाभी भी खड़ी थीं। उन्हें देख भइया भी उस भीड़ में शामिल हो गए। सारी बातें सुनकर कुछ महिलाएँ वहाँ अपना नाम लिखवाने लगीं। तारानगर वाली भाभी ने अफजल भइया को भी अपनी पत्नी का नाम जुड़वाने को कहा। 2009 में जरीना दीदी एकता प्रगति समूह से जुड़ गयीं। उनकी बचत 50 रुपये से शुरू हुई और उन्होंने अपना पहला लोन 1000 रुपये का लिया। इसी तरह वे समूह में लगातार बचत करने लगीं। ऐसे ही 5 साल बीत गए।

एक दिन उनके पति कहने लगे कि उन्हें अजीब सी घबराहट हो रही है। “मेरे पति की तबियत अचानक बिगड़ गयी तो उन्हें इन्दौर अस्पताल लेकर गये। पता चला कि उनकी किडनी खराब हो गयी है। समूह से लोन लेने के बावजूद, उनके इलाज के लिए बहुत ज़्यादा पैसो की जरूरत पड़ रही थी। मैंने तत्काल अपने जेठ से भी पैसे मंगवाये। बहुत खर्चा करने बाद भी मेरे पति न बच पाये। शायद उनको पहले से ही बीमारी का पता चल गया था तभी वे मुझे समूह से जुड़वा गये।” पास ही रखी बाल्टी से गीला कपड़ा निकालकर जरीना दीदी चुप-चाप पोछा लगाने लगीं। मैं पलंग पर पैर ऊपर करके बैठ गई।


अपने पति के गुजरने के बाद जरीना दीदी सदमे में चली गईं। कुछ महीनों तक वे समूह की किसी भी मीटिंग में नहीं गईं। उन्होंने सिलाई करना भी छोड़ दिया। उनके जेठ ने घर खर्च की पूरी जिम्मेदारी अपने कन्धों पर ले ली। इसके बावजूद इस हालत में तीन बच्चों को सम्भालना दीदी के लिए मुश्किल होता जा रहा था। इन दिनों उनके बेटे, शोएब की तबीयत भी थोड़ी खराब रहने लगी। एक महीने बाद जरीना दीदी ने अपनी बेटियों कायनात और अरसी को उनकी फुफ्फो के यहाँ भेज दिया। एक दिन जरीना दीदी की सास ने उनके सामने हाथ मशीन लाकर रख दी। उन्होंने दीदी से कहा कि वे वापस सिलाई करना शुरू करें। बहुत मनाने के बाद उन्होंने आखिरकार मशीन चलाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे वे समूह की मीटिंग में फिर से जाने लगीं, वहाँ बाकी महिलाओं से मिलकर उनका मन हल्का हो जाता था। 


जरीना दीदी के बेटे, शोएब की तबियत अब बिगड़ती ही जा रही थी। उसे कई डाॅक्टरो को दिखाने के बाद इन्दौर के एक बड़े अस्पताल भी लेकर गये। वहाँ पता चला कि उसको अपने पिता की तरह ही किड्नी में समस्या थी। एक दिन शोएब को अजीब सी घबराहट होने लगी और उसने लम्बी सांसे भरना शुरु कर दिया। जब तक उसे अस्पताल पहुँचाया गया, तब तक बहुत देर हो गयी थी। कुछ समय बाद जरीना दीदी को खबर दे दी गई। बेटे के जाने के बाद जरीना दीदी पूरी तरह अकेली पड़ गयीं। उन्होंने सोचा कि वे अपनी बेटियों को अपने पास वापस बुलालें। पर जरीना दीदी के जेठ पर वैसे ही घर खर्च की ज़िम्मेदारी थी, तो दीदी ने कायनात और अरसी की पढ़ाई का खर्चा उठाने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेली। उन्होंने अब पड़ोस की सिलाई का काम लेना शुरू कर दिया। कुछ ही समय में हर रोज़ 30 से 40 रुपये की आमदनी आना शुरू हो गई। पर इनके पास अभी जो मशीन थी, उसको चलाने के लिए हाथ से ही पहिया घुमाना पड़ता था। पहिया घुमाते-घुमाते उनका पूरा दाहिना हाथ दर्द करने लगता था। ऊपर से मशीन के बार-बार खराब हो जाने से जो सिलाई का काम आता था, वह भी वापस चला जाता था। इस कारण उनकी आमदनी थोड़ी ही हो पाती थी। उनकी सास ने यह देखते हुए दीदी से कहा कि वे एक मोटर से चलने वाली सिलाई मशीन खरीद लें। वे दोनों बाजार में मशीन का भाव पूछने गईं। वहाँ कई दूकानों में पूछताछ करने पर पता चला कि अच्छी मशीन का भाव 8000 रुपये से कम न था। वे निराश हो कर घर वापस आ गईं।

“फिर आपको ये नई सिलाई मशीन कहाँ से मिली?”

सितम्बर 2018 में संकुल की मीटिंग हुई। इस मीटिंग में 15-20 समूहों से दो-दो महिला सदस्य आईं। मीटिंग के दौरान सदस्यों से कहा गया, “दूसरे संकुलों से सिलाई मशीन की मांग आ रही है। क्या आपकी भी यही मांग है?” यह सुनते ही जरीना दीदी खुश हो गईं। बाकी सदस्यों के साथ उन्होंने भी सिलाई मशीन की मांग रख दी। इसी तरह 11 संकुलों से भी मशीनों की मांग आई। इन संकुलों से बनी समिति में चर्चा होने लगी। समूूह की अगली मीटिंग में जरीना दीदी ने पूछा, “मशीन का क्या हुआ?” “थोड़ा इन्तजार करो दीदी!।”, समूह संचालक, मितान ने कहा। “समिति की 8-9 महिलाएँ सही भाव पता करने बड़वाह, इन्दौर और सनावद की दूकानों पर गयीं हैं।” एक दिन फिर समूह की मीटिंग चल रही थी। हिसाब-किताब की बाते जब हो गई, तो मितान ने कहा, “बाजार में मिलने वाली 8400 रुपये की मशीन, सनावद से 7300 रुपये में मिल रही है। क्या ये भाव आप के लिए ठीक है?” उस वक्त किसी के कुछ भी बोलने से पहले जरीना दीदी के मुँह से निकला, “हाव, ला दो।” महिलाओं के संगठित प्रयास से छयासी मशीनें छः लाख सत्ताईस हजार आठ सौ रुपये में आईं। इतनी मशीनें एक साथ लेने पर लगभग एक लाख रुपये की कुल बचत हुई। 



20 दिसम्बर 2018 के दिन जरीना दीदी के घर मोटर वाली बड़ी, सिलाई मशीन आ ही गई। इसकी किश्तों को उन्होंने कभी 500 तो कभी 1000 रुपए प्रतिमाह देकर चुकाना तय किया। “2-3 रोज में जब मुहल्ले वालों को मेरी नई मशीन के बारे में पता चला तो सिलाई का और काम आने लगा। अब दिन के 50 से 100 रुपये मिल जाते हैं।” जरीना दीदी ने सिलाई के साथ-साथ अंडे बेचने का काम भी शुरू किया। कुछ समय बाद वे अपने घर में मुहल्ले के बच्चों को उर्दू भी पढ़ाने लगीं। ये सब मिलाकर वे हफ्ते के 1000-1200 रुपये कमाने लगीं हैं। अब उनकी बेटियाँ भी उनके साथ रहने लगी हैं। कायनात ग्यारवी कक्षा में है और अरसी चौथी में, उनकी पढ़ाई का खर्चा दीदी खुद उठा रहीं हैं। वे कहती हैं कि बेटियों को पढायेंगीं ताकि वे खुद अपने पैरों पे खड़ी हो सके। 

“वाह दीदी! आप पर कहानी लिख लूँ क्या?”, मैंने एकदम से पूछ लिया। जरीना दीदी चुप हो गईं। अपने हाथों से कानों के पीछे पहले से ही खुसी हुई चुन्नी को और खोंसने लगीं, फिर धीरे से मेरी ओर देखते हुए बोलीं, “हाँ, लिख लो।” मैं थोड़ी देर उनके साथ बैठी रही। जब घर जाने का समय हो गया तो हर बार की तरह वे मुझे दरवाजे तक छोड़ने आयीं और कहा, “और आना”।  

Researched and Voiced by Varsha Ransore

Story writers: Varsha Ransore, Ajaad Singh Khichi, Jyoti Garhewal, Milind Chhabra and Sameer Rangrej

Sound recording and design: Milind Chhabra and Pradeep Lekhwar

Drawing: Maya Janine

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