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पानी की राह

अपडेट करने की तारीख: 17 अक्तू॰ 2021

नोट - पॉडकास्ट सुनने के लिए कृपया नीचे त्रिकोण (▶) को दबाये|


Research: Laxminarayan Devda

Story writers: Laxminarayan Devda, Pradeep Lekhwar, Iqbal Hussain

Voice: Roshani Chouhan

Mentor & Guide: Pinky Brahma Choudhury

Sound recording: Rabindra Kumar Barik, Pradeep Lekhwar

Sound design: Iqbal Hussain

Sound mixing: Iqbal Hussain,Pradeep Lekhwar

Art work: Maya Janine




सेमली गाँव की ग्यारसी काकी और पन्ना काका आज से लगभग 30 साल पहले पानी की खोज में गाँव से दूर अपने खेत में आकर बस गये। कुछ दिन बाद दोनों पति-पत्नी, अपनी चार बेटियों, एक बेटा और दो मजदूरों के साथ कुँआ खोदने में लग गये। पाँच से छः हाथ तक तो कुँआ खोदने में थोड़ी आसानी रही। पर जैसे-जैसे कुँआ गहरा होता गया उनकी मुश्किलें बड़ती गई।


गहरे कुँए से मिट्टी की टोपली को ऊपर लाने में साँसें फूल जाती थी। तभी काका ने कुँए के ऊपरी तल पर लकड़ी के दो खूँटे गाड़े और उन दोनों के बीच में लकड़ी फँसाकर उसमें घिरनी लगाई। फिर घिरनी में रस्सी डालकर मिट्टी से भरी टोपली को ऊपर खींचनें के लिए, अपने बच्चों को लगा दिया। चारों बेटी अपनी पूरी ताकत से रस्सी खींचती और जैसे ही टोपली ऊपर आती उसे झट से पकड़कर मिट्टी खाली कर देती। दिन भर रस्सी खींचते-खींचते बच्चों के हाथों में छाले पड़ जाते थे।


बारिश के दिनों में कुएँ का काम बंद रखते थे। पर सर्दी लगते ही कुआँ खोदने में फिर से जुट जाते, जो गर्मी भर चलता था। एक साल बीतने के बाद जब कुआँ 18 हाथ गहरा हुआ तो उसमें हल्की पानी की झीर निकलने से परिवार के चेहरे पर मुस्कान आ गई। अब काका-काकी को भरोसा हो गया था, कि उनकी सालों से सूखी पड़ी जमीन पर वे रबी सीजन में गेहूँ-चने की फसल बो पायेंगे।


लेकिन जैसे ही कुआँ 20 हाथ गहरा हुआ, उसमें पानी की झीर बढ़ने की जगह सूखी सफेद चूना मिट्टी आ गई। उसे देख काका एकदम टूट से गये, क्योंकि उन्हें पता था, सफेद मिट्टी में कभी भी पानी नहीं निकलता। परिवार की तीन सालों की मेहनत चूना मिट्टी में मिल गई। यह उनका चौथा कुँआ था, जिसमें भी पानी नसीब नहीं हुआ।


यह अनुभव पूरे सेमली गाँव का था। सेमली गाँव मध्यप्रदेश के देवास जिले की नर्मदा घाटी में बसा हुआ है, जहाँ अधिकतर सीमान्त आदिवासी किसान परिवार रहते हैं। उस समय यहाँ हर किसान के खेत में कुँआ तो था, पर पानी नहीं। गर्मी में तो लोग 3 किलोमीटर पैदल चलकर कनाड़ नदी के तल पर जगह-जगह गड्डा खोदकर पीने का पानी लाते थे। गाँव के लोगों का जीवन केवल बारिश की ही फसलों पर निर्भर था। साल में अच्छी बारिश हुई तो चार-छः महीने खाने के लिए अनाज की व्यवस्था हो जाती थी। रबी के सीजन में लोगों को गाँव छोड़कर मजदूरी करने मालवा जाना पड़ता था।


सूखे की समस्या हल करने के लिए सरकार ने वर्ष 2002 में सेमली गाँव से 4 किलोमीटर दूर महीगाँव बाँध बनाना शुरू किया। जिसके लिए झिरपनिया गाँव के 25 से 30 परिवारों को विस्थापित किया गया। यह बाँध झिरपनिया गाँव के दो नालों के संगम पर 575 मीटर लम्बा और 18 मीटर ऊँचा बन रहा था, इसके पानी से लगभग 618 हैक्टेयर जमीन सीचिंत होने का अनुमान था।


पहली बार इस क्षेत्र में इतनी बड़ी-बड़ी मशीने और डंफर देखने को मिले, जिनकी आवाज दूर तक सुनाई पड़ती थी। इस काम को देखने के लिए आस-पास के लोगों के साथ कई बार पन्ना काका भी जाते रहते थे। बाँध वाली जगह पर खड़े होकर लोग अंदाजा लगाते ’’ऐका म तो भोत पाणी समायगो, पर इतरो बड़ो बाँध भरायगो की नी?’’ ’’गारा की पाल कदि फूटी गय तो पूरो पाणी निकली जायगो और गाँव पाणी म भवय जायगो’’

दो साल में बाँध बनकर तैयार हो गया और बारिश के मौसम में पानी से लबालब भर गया। इसका पानी खेतों तक ले जाने के लिए एक बड़ी नहर बनाने का काम शुरू हुआ, जो महिगाँव, बोरखेड़ी, कनाड़ और सेमली गाँव के लिए बन रही थी।


नहर का काम जैसे-जैसे आगे बड़ता गया, वैसे-वैसे पानी के लिए गाँव के लोगों के साथ पन्ना काका की उम्मीद भी बड़ती गई। पर 4 किलोमीटर नहर बन जाने के बाद कनाड़ और सेमली गाँव की सीमा पर अधिक ऊँचाई वाली जगह आने के कारण, नहर का काम रूक गया। जिससे पन्ना काका और लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर गया। इतना बड़ा बाँध बनने पर भी सेमली गाँव के किसानों को पानी नहीं मिल पाया।

पन्ना काका की जमीन पियत न होने के कारण साल भर खाने के अनाज की पूर्ति नहीं हो पा रही थी। उनके बच्चे भी शादी लायक हो गये थे, जिससे उनकी चिन्ता दिन-प्रतिदिन बड़ती जा रही थी। उन्होंने कुछ पैंसा मजदूरी करके और कुछ सेठ साहूकारों से कर्ज लेकर, अपने पाँचों बच्चों की शादी बारी-बारी से कर दी। गाँव में काम न मिलने के कारण उनके लड़के को परिवार सहित काम की तलाश में इन्दौर पलायन करना पड़ा। अब घर में काका और काकी अकेले ही रह गये थे।


सेमली गाँव के लोगों ने 2 साल तक नहर बनने का रास्ता देखा पर काम आगे नहीं बढ़ा। एक दिन शाम को गाँव के सरपंच ने डोंडी पिटवाकर लोगों को चौपाल पर इकट्ठा होने को बोला। अगली सुबह बैठक में गाँव के लोगों के साथ पन्ना काका भी शामिल हो गये। सरपंच ने सुझाव दिया “क्यों न हम बड़ी नहर को बीच से काटकर, जंगल के बीच से एक छोटी नाली खोदें और उसे गाँव के निचले हिस्से में बहने वाले नाले में मिला दें। जब उसमें पानी आ जायेगा तो लोग अपने-अपने मोटर-पाईप से सिंचाई कर लेंगे।’’


तभी किसी ने कहा, “घर म खाणों को दाणो नी है बच्चा न को पेट भरंगा की नाली खोदंगा “ कोई बोला, “ जब इना काम क सरकार नी करी पाई तो हम कई करी लेवेंगा ?“ फिर भी कुछ लोगों ने हिम्मत जुटा कर कहा “अगर हम सब मिलीजुली न काम करंगा तो पाताल से भी पाणी लय पावंगा।“ पीछे बैठे पन्ना काका चुपचाप सारी बातें सुन रहे थे।

बैठक खत्म होने के बाद पन्ना काका अपने घर आ गये। ग्यारसी काकी दीवार पर लिपाई कर रही थी। काका को चुपचाप चारपाई पर बैठे देख काकी ने पूछ लिया ’’कय हुयो मीटिंग म?’’ काका ने उदास मन से कहा ’’जंगल स नाली खोदिन पाणी लाणा की बात चली री ’’ ’’अपणा खेत म पाणी आयगो की नी?’’ काकी ने धीमी आवाज में पूछा।


कुछ दिनों बाद सेमली गाँव के लोगों ने गाँव की वन सुरक्षा समीति और स्थानीय वन विभाग से जंगल के बीच से नाली खोदने की अनुमति मांग ली। लेकिन नाली कितनी गहरी और किस जगह खुदनी है, इस बात का किसी को भी अंदाजा नहीं था। इसलिए गाँव के सरपंच ने तकनीकी सलाह के लिए समाज प्रगति सहयोग संस्था से मदद माँगी। संस्था उन दिनों सेमली गाँव में पानी रोकने और बचत समूह का काम कर रही थी।

संस्था के कार्यकर्ताओं ने सर्वे करके बताया कि जंगल के बीच, 500 मीटर लम्बी, 2 मीटर चौड़ी और 4 मीटर गहरी नाली खोदनी पड़ेगी, तभी गाँव के नाले में पानी जा पायेगा। चार साल तक हर गर्मी के दिनों में गाँव के लोगों ने श्रमदान करके नाली खोद डाली।


वर्ष 2011 में जब पहली बार रबी के सीजन में बाँध का पानी नाली से होते हुए गाँव के नाले में आया, तो इसे देखने पूरा गाँव उमड़ पड़ा। नाले के आस-पास और दूर के कुछ सक्षम किसानों ने मोटर-पाइप लगाकर अपनी जमीनों में पानी देकर गेंहूँ-चना बो दिया। पर इस बार भी पन्ना काका और उनके मुहल्ले के कुछ किसान पानी की राह देखते ही रह गये, क्योंकि उनके खेत नाले से लगभग ढ़ाई हजार फीट दूर चढ़ाई पर थे। वहाँ तक पानी पहुँचाने के लिए मोटर, पाइप का खर्चा 50 हजार रूपये आ रहा था। वे लोग इतने पैंसों की व्यवस्था नहीं कर पाये, जिस कारण उनके खेत सूखे ही रह गये।


बारिश की फसल के अलावा दूसरी फसल न बोने के कारण पन्ना काका को पहले की तरह ही दूसरे के खेतों में मजदूरी करके गुजारा करना पड़ रहा था। एक दिन काका अपने पड़ोस के गाँव कनाड़ में गेहूँ काटने गये हुए थे। वहाँ समाज प्रगति सहयोग संस्था के कार्यकर्ताओं को जमीन में पाइप बिछाते देख काका ने पूछ लिया ’’इतरा बड़ा-बड़ा पाइप क्यूँ बिछई रिया?’’ तो कार्यकर्ता ने जबाब दिया. ’’काका सरकार ने बड़ी नहर तो बना दी, पर किसानों के खेतों तक पानी ले जाने की कोई व्यवस्था नहीं की। किसान खुद ही पाइप डाल के पानी ले जाने का जुगाड़ करते हैं, पर पाइप का खर्चा सभी के पास नहीं होता और कई बार तो पाइप भी चोरी हो जाते हैं। इसलिए हम बच्चा नहर बनाकर बड़ी नहर से किसान के खेत तक पानी पहुँचाने की व्यवस्था कर रहे हैं। इस तरीके से बिजली, पानी और पैंसा भी बचेगा।

काका दुखी मन से बोले ’’हमरा जसा लोग न क सब भूली गया, सरकार भी अन तुमरा जसा लोग भी’’ कार्यकर्ता ने विश्वाश दिलाते हुए कहा ’’ऐसी बात नहीं है काका, अगर आपके गाँव के लोग इस काम को करने के लिए तैयार होते हैं तो हम जरूर काम करेंगे।’’


कुछ महीनों बाद जब संस्था के कार्यकर्ता और पन्ना काका गाँव के लोगों से नहर बनाने की बात करने लगे, तो कई लोग ठीक से जवाब नहीं दे रहे थे। खासकर वे लोग जिनकी सिंचाई की व्यवस्था हो गई थी। कुछ को तो भरोसा ही नहीं था, कि नहर का पानी उनके खेतों तक भी आयेगा। पर संस्था के कार्यकर्ता लगातार प्रयास करते रहे, जिससे धीरे-धीरे गाँव के लोग इस काम के महत्व को समझने लगे।


कुछ दिनों बाद नहर बनाने के लिए सेमली गाँव में विशेष ग्राम सभा बुलाई गई। उस दिन ग्राम सभा में पन्ना काका के साथ ग्यारसी काकी भी शामिल थी। जो किसान नाले से पानी ले भी जा रहे थे उन्होंने भी अपनी समस्या बताई ’’हम घंव-चणा की फसल तो पकय लेवाँ पर मोटर, पाइप न बिजली म इतरो ज्यादा खर्चो हुय जाय कि ओकाम कई नी बचतो। कय बार तो वो नाला का ऊपरी हिस्सा वाला किसान पाणी रोक लेय तो नीचे पाणी नी आय। कई बार बिजली नी होय तो नाला म पाणी असोज भवय न चली जाय।’’


इन चर्चाओं के बाद सरपंच ने सर्व सहमति से नहर बनाने का प्रस्ताव पारित किया और उसे बागली तहसील में सिंचाई विभाग को दिया गया। लेकिन सिंचाई विभाग के पास बजट न होने के कारण वे काम नहीं कर पाये, पर नहर से पानी ले जाने की इजाजत दे दी।


नहर को आधा किलोमीटर वन विभाग के जंगल से होते हुए गाँव तक लाना था। इसकी अनुमति लेने के लिए गाँव के लोग स्थानीय विधायक और वन विभाग के पास गये। कई बार जाने के बाद एक दिन रेंजर साहब ने वन सुरक्षा समीति के सदस्यों के साथ नहर बनाने वाली जगह का मुआयना किया। जगह देखने के बाद उन्होंने काम करने की अनुमति दे दी।


अनुमति मिलते ही वर्ष 2018 में संस्था ने सेमली गाँव में नहर का काम लोगों की सहभागिता से करने का निर्णय लिया और सहभागी सिंचाई प्रबंधन के नाम से सर्वे शुरू किया। सर्वे से निकलकर आया कि जंगल से होते हुए खेतों के ऊपरी भाग में मुख्य नहर के लिये 3 किलोमीटर बड़ी पाइप लाइन बिछानी होगी। साथ ही सभी किसानों के खेतों तक बिना मोटर बिजली के पानी पहुँचाने के लिए 6 छोटी बच्चा नहर भी बनानी होगी। इससे लगभग 164 हेक्टेयर जमीन सींचित होगी और इस काम को करने के लिए लगभग 1 करोड़ रूपये की लागत आयेगी।


शुरुवात में इस काम के लिए संस्था ने 20 लाख रूपये दिये और गाँव के प्रत्येक किसान से प्रति बीघा 3 हजार रूपये का योगदान लिया गया। जिनके पास पैंसे नहीं थे उन्होंने श्रमदान करने में अपनी सहमति जताई। मीटिंग में निर्णय लिया गया कि जैसे-जैसे पैसों की व्यवस्था होती जायेगी वैसे-वैसे यह काम आगे बढ़ता जायेगा।

उसी साल गर्मी के मौसम में जंगल से पाइप लाइन बिछाने का काम शुरू हुआ। इस काम को जल्दी करने के लिए जे.सी.बी. मशीन द्वारा नाली खुदवाई गई। लोगों में इतना उत्साह था कि तप्ती धूप में 2-2 क्विन्टल वजन वाले सींमेट के पाइप, नाली में हाथों से ही धकेल दिए। दो महीने में ही जंगल से गाँव तक की आधा किलोमीटर पाइप लाइन बिछ गई।


अगले साल पाइप लाइन से पानी खेतों तक ले जाने के लिए, पन्ना काका के खेत से पहली छोटी बच्चा नहर बनाने की शुरूवात हुई। जमीन से 2 फीट ऊपर, सीमेन्ट का 1 फीट चौड़ा और आधा फीट गहरा खुला पाइप बिछाया गया, जिसमें सिंचाई के लिए जगह-जगह वॉल लगाये गये। एक महीने में बच्चा नहर बनकर तैयार हो गई। इससे 8 किसानों की 10 हेक्टेयर जमीन सींचित होनी थी।


नहर के रखरखाव के लिए जल उपयोगकर्ता समूह बनाया गया, जिसमें निर्णय लिया गया कि नहर की मरम्मत के लिए सभी किसान 25 रूपये महीना बचत करेंगे और बारी-बारी से अपने खेतों में सिंचाई करेंगे।


रबी सीजन में जब पहली बार बाँध का पानी पाइप लाइन में छोड़ा गया तो उस दिन सेमली गाँव में उत्सव जैसा माहौल था। उस दिन गाँव के कई लोग पन्ना काका के घर के आस-पास जमा हो गये थे। महिलाओं के साथ ग्यारसी काकी भी पूजा की थाली लिए, पानी आने का इंतजार कर रही थी। उस दिन सबकी नजरें पाइप लाइन पर टिकी हुई थी। काका के चेहरे पर खुशी तो थी पर उन्हें अन्दर ही अन्दर चिन्ता सता रही थी, कि इस बार भी पानी आयेगा की नहीं?


पानी आने की कुछ देरी का समय उन्हें कई सालों के इंतजार से भी लम्बा लग रहा था। कभी वे पाइप में कान लगाकर पानी आने की आवाज सुनते, तो कभी बच्चा नहर के आस-पास चक्कर लगाते। कुछ समय बाद जब पाइप के अन्दर से तेज गूंजती हुई गुड...गुड... की आवाजें सुनाई देने लगी तो इसे सुन काका का चिन्तित चेहरा खुशी से खिल उठा। बच्चा नहर में पानी आते ही लोगों की भीड़ नहर के पास इकट्ठी हो गई। ग्यारसी काकी और पन्ना काका ने नारियल फोड़कर पूजा की और कहने लगे ’’आज तो घर बठ्अ नर्मदा माय अई गई।’’ रबी सीजन में अपनी सूखी पड़ी जमीन पर जब वे बैल जोतकर पहली बार गेहूँ-चना बोने लगे तो उनकी बूढ़ी आँखे छलक पड़ी।





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