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वीरान

अपडेट करने की तारीख: 11 अक्तू॰ 2021



कितनी बार बोला है, तुम्हारा गाँव वीरान है, तुम सब हमारी बामनपुरी पंचायत की ग्रामसभा में क्यों आ जाते हो? सरपंच प्रतिनिधि ने झल्लाते हुए कहा।


उनकी बात सुनकर, ग्रामसभा में एक तरफ बैठी महिलाओं में से, राजकुंवर बाई तुनक कर बोली, ”हम वोट बामनपुरी पंचायत में डालते हैं, राशन कार्ड यहाँ का है, आधार कार्ड भी यहाँ का, फिर हम कहाँ जायेंगे?”


बामनपुरी पंचायत की ग्रामसभा में, इस तरह का वाकया कई दफा हो चुका है। जब भी महिलाएँ कुछ मांग की बात रखती हैं, तो उन्हें अक्सर याद दिलाया जाता है, कि उनका गाँव वीरान है। यह महिलाएँ उस बस्ती से आईं हैं, जहाँ की जमीन सरकारी दस्तावेजों में पड़त है।


आज से करीब चालीस साल पहले, बामनपुरी और बिलाली पंचायतों के बीच, नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के अंतर्गत, बने तालाब में कई किसानों की जमीन डूब में चली गई। बामनपुरी पंचायत के गाँव, ससलिया के किसानों को मुआवजे में जो पैसे मिले थे, उन्हीं में से कुछ किसानों ने खेती के लिए जमीन खरीद ली, और कुछ एक ने बामनपुरी के पटेल से तालाब के किनारे, जमीन खरीदकर घर बना लिए। ससलिया गाँव के और भी लोग, यहाँ आकर बसने लगे। धीरे-धीरे यह एक बस्ती बन गई।


यह बस्ती तीन नामों से जानी जाती है- यहाँ के निवासी ससलिया गाँव से आए है, इसलिए कुछ लोग ”ससलिया” कहते हैं। बस्ती में तेजाजी महाराज का एक छोटा सा मंदिर है, इसलिए इसे ”ससलिया तेजाजी नगर” भी कहते हैं। जिस पड़त जमीन पर ये बस्ती बसी है, उसके पड़ोस में ”मालीपुरा ”नाम का एक गाँव हुआ करता था। दशकों पहले, किसी महामारी की चपेट में आने से, ”मालीपुरा ”गाँव का नामों निशान मिट चुका है। यह बस्ती उसी गाँव की सीमा पर होने के कारण, यहाँ के लोगों के राशन कार्ड पर,”मालीपुरा” लिखा है, इसलिए इसे ”मालीपुरा” भी कहते हैं।


चाहे मैं, या तुम, या फिर कोई गाँव ही सही, सभी अपने नाम से ही पहचाने जाते हैं। यह बस्ती,जिसका 25 सालों में भी, एक नाम तय नहीं हो पाया, ऐसा गाँव, जिसकी सरकारी दस्तावेजों में भी जगह नहीं, उस बस्ती के लोगों को, अपना ठिकाना बताना मुश्किल ही होता है।


आज भी, जब कोई इनसे गाँव का नाम पूछता है, तो ये सोच में पड़ जाते हैं, कौनसा नाम बताएं ? सबका जवाब एक जैसा नहीं होता। बस्ती में एक प्राइमरी स्कूल है, जो शिक्षा गांरटी शाला योजना के तहत बना दिया था। यहाँ गिनती के ही बच्चे पढ़ने आते हैं।


इस बस्ती के लोगों के पास थोड़ी बहुत खेती है, इससे इनकी दाल-रोटी तो चल जाती है। छोटे-मोटे हाथ खर्च के लिए, गाय-भैंस भी पालते हैं। साथ ही गाँव के युवक, बीस से पच्चीस किलोमीटर दूर, बड़वाह और खोड़ी की शराब फेक्ट्रियों में मजदूरी करते हैं।


बस्ती के कच्चे रास्ते पर नीम और शहतूत के पेड़ लगे हैं। किसी-किसी घर के सामने पेड़ इतने हैं, कि घर ही नहीं दिखता। घरों के आंगन में झाडू लगाकर रास्ते पर ही पत्तियों का ढेर लगा देते हैं। नहाने, कपडे़ और बर्तन धोने का पानी, रास्ते पर बहता रहता है। किसी के घर के सामने गंदा पानी, और तेल, साबून, शेम्पू के पैकेट पानी के साथ इकट्ठा हो जाए, तो कभी भी इन लोगों के बीच झगड़े की नौबत आ जाती है। हर घर के बाहर एक कोने में, एक-आधा लीटर जितने छोटे रंगीन डिब्बे, कई जगह दीवारों की खूटी पर लटकते रहते है।

सुबह-सुबह ज्यादातर लोग ये डिब्बे लेकर, बाहर कि ओर जाते देखने को मिलते हैं। बस्ती में शौचालय न के बराबर हैं। शौच के लिए खासकर, बुजुर्गों और महिलाओं को बहुत आफत झेलनी पड़ती है। सुबह जल्दी उठकर रास्ते किनारे, या खेतों में जाना पड़ता हैं। रात के समय तो, डर सा बना रहता है, राह चलते वहाँ कब कौन आ जाए, कोई ठिकाना नहीं।


आज से करीब पच्चीस साल पहले इस बस्ती के लोग अपने गाँव ससलिया की बिलाली पंचायत में वोट डालते थे, पर बिलाली पंचायत से इन्हें राशन के अलावा और कोई सुविधा नहीं मिलती थी। उस समय बामनपुरी के सरपंच हरिराम ने बस्ती के लोगों से बोला कि, “तुम्हारी बस्ती को मैं, बामनपुरी पंचायत में जुड़वा देता हूँ, तुम्हारे राशन कार्ड भी यहीं से बनवा दूंगा, तुमको राशन लेने 2 किलोमीटर बिलाली पैदल नहीं जाना पडे़गा। वैसे भी बिलाली पंचायत ने तुम्हारी इस बस्ती में इतने सालों में कोई काम भी तो नहीं करवाया है।”

सरपंच हरिराम ने बस्ती को बामनपुरी पंचायत में जुड़वा दिया और पंचायत से राशन कार्ड भी बनवा दिए। कुछ महीनों बाद सरपंच हरिराम का कार्यकाल भी पूरा हो गया।


सन् 2001 के पंचायत चुनाव में अलग-अलग सरपंच उम्मीदवार प्रचार करने और वोट मांगने इनके घर आने लगे। एक सरपंच उम्मीदवार ने बस्ती वालों से वादा किया कि “तुम्हे इस जमीन के पट्टे बनवाकर दूंगा और तुम्हारे इस गांव में काम भी करवाऊंगा।“

बस्ती की महिलाओं ने उम्मीदवार से बस एक ही मांग रखी “हम तुमारे ही वोट दांगा पर हमारी बस्ती का घर हुण में लाइट की व्यवस्था करवानी पडे़गी, पांच साल तक तुमार से और कई नी मंगंगा।“

उस सरपंच उम्मीदवार ने, चुनाव जीतते ही बस्ती में लाइट की व्यवस्था करवा दी। समाज प्रगति सहयोग संस्था पिछडे़ आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के साथ काम करती है। सन् 2015 में संस्था द्वारा संचालित बचत समूह कार्यक्रम के बारे में समझकर बस्ती की महिलाओं ने ”शानू प्रगति बचत समूह“ का गठन किया। बचत समूह से लोन लेकर मवेशी पालन कर अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उन्हें एक जरिया मिल गया। साथ ही महिलाओं को बस्ती की समस्याओं पर बातें करने के लिए एक मंच भी मिला।


“घर का सामने जो रस्ता पे पानी बीरियो है उको हम कई करा? तुमारा पास कोई उपाय होय तो उ बताव।” कृष्णा दीदी ने, समूह संचालक मितान ज्योति दीदी से बचत समूह की मीटिंग में पूछा।

”दीदी आप जिस तरह समूह में अपनी समस्या पर बेझिझक होकर बातें करते हो, उसी तरह ग्रामसभा में बस्ती की नाली और रोड की समस्या पर अपनी बात रख सकते हो।“ ज्योति दीदी ने जवाब दिया।


पहली बार बस्ती की महिलाएँ बामनपुरी पंचायत की ग्रामसभा में गईं। स्कूल भवन में जहाँ भी देखों पुरूष ही पुरूष बैठे थे। सबसे पीछे एक कोने में गिनती की बस 6 महिलाएँ घूंघट करके बैठी थी। बस्ती की 9 महिलाएँ कोने में बैठी इन महिलाओं के पास जाकर बैठ गईं और अपनी बारी का इंतजार करने लगीं। इतने पुरूषों की भीड़ में महिलाओं की आवाज़ कहीं दब सी गई थी।


ग्रामसभा की कार्यवाही चलती रही सरपंच प्रतिनिधि ने बस्ती की महिलाओं से कहा “लाव तुम्हारी कई समस्या“


”तम है नी घर का सामने नाली खुदवई दो और उना रोड के पक्को बनवई दो।” कला दीदी ने निवेदन करते हुए सरपंच प्रतिनिधि से कहा।

“हाँ देखते है” सरपंच प्रतिनिधि ने मुस्कुराते हुए कहा।


एक दो साल तक ग्राामसभा मीटिंग में ऐसा ही चलता रहा, बस्ती की महिलाएँ ग्रामसभा में आतीं औैर सरपंच-सचिव से विनती करके वापस चलीं जातीं। हर माह समूह मीटिंग में सामाजिक और स्वास्थ्य के कई विषयों पर बात करने से महिलाओं की झिझक भी धीरे-धीरे दूर होने लगी। बस्ती की महिलाएँ अब खुलकर बस्ती की समस्याओं पर बातें करने लगीं। धीरे-धीरे सरपंच प्रतिनिधि का रवैय्या इनके प्रति बदलने लगा।


एक दिन ग्रामसभा में सरपंच प्रतिनिधि ने गुस्से से कहा ”तुम्हारा गाँव वीरान है, तुम सब हमारी बामनपुरी पंचायत की ग्रामसभा में मत आया करो“ और इन्हें ग्रामसभा में बैठने तक नहीं दिया।


अगले महीने बस्ती में बचत समूह की मीटिंग हुई, जिसमें महिलाओं ने ग्रामसभा में जो कुछ उनके साथ हुआ वो समूह संचालक ज्योति दीदी को बताया।


“तमारा केणा पे हम कित्तीज बार ग्रामसभा भी जई आया हमके सब लोग हुण का सामने डांट के भगई दे, हमारी वहाँ कई इज्जत रे जाय।” कृष्णा दीदी ने समूह संचालक ज्योति दीदी को कहा।


“बस्ती में काम करवाय नी करवाय वा बात तो रयगी और अब तो वी लोग नई ज बात बोले की तुमारी बस्ती वीरान है, यो और कई होय” रूखमणी दीदी ने चिंतित होकर समूह संचालक ज्योति दीदी से पूछा।


”दीदी, ऐसी जगह जहाँ कोई इंसान नही रहता उसे वीरान कहते है। “ ज्योति दीदी ने समझाते हुए सभी समूह सदस्य को बताया।


“हमारी जीती जागती बस्ती उके वीरान दिखरी है। चुनाव का टाइम पे योई सरपंच वोट डलवाने का लिया ट्रेक्टर में बिठई-बिठई के ली जाय। जब तक वोट नी डले तब तक खुब काकी-भाभी करे और वोट डलिया, की जाओं पैदल। अब बोले की हम उकी पंचायत में नी है।“ राजकुंवर दीदी तिलमिलाते हुएं बोली।

“आपके गाँव का सरकारी दस्तावेज में कोई उल्लेख ही नहीं है। दीदी आपकी बात यहाँ पंचायत में कोई नही सुन रहा है, तो आप सभी बस्ती वालों के साथ जनसुनवाई में जाओं, हर मंगलवार बड़वाह के जनपद भवन में जनसुनवाई होती है।” समूह संचालक ज्योति दीदी ने महिलाओं को दिलाशा देते हुए कहा।


यहाँ की महिलाएँ, बस्ती को आबाद करने के लिए जद्दो जहद में लगी रही। पर बस्ती के कुछ लोग इन पर ताना कसा करते हैं। ”इनसे इनका घर तो संभलता नी सब कामीज करवई लेगी बाई की जात होण“


बस्ती को सरकारी दस्तवेजों में आबाद कराने के लिए महिलाओं ने अपनी बस्ती के स्कूल शिक्षक से एक आवेदन तैयार करवाया।


मंगलवार के दिन लगभग सुबह 11 बजे बस्ती की महिलाएँ और कुछ भइया बड़वाह के जनपद भवन पहुंच गए। कई गाँवों से सेकड़ों लोग वहाँ अपनी और गाँव की समस्या लेकर आते हैं। तकरीबन 1 बजे इन लोगों की मुलाकात एस.डी.एम. सर से हो पाई। एस.डी.एम. सर और उनका मोबाइल थोडे़ व्यस्त मालूम पड़ते हैं। मोबाइल को एक तरफ रखकर वो लोगों की बातें भी बडे ध्यान से सुनते हैं। महिलाओं ने सर को आवेदन दिया और बताया कि हमारे गाँव में न तो ढंग का रोड है और ना ही शौचालय बने हैं। जब भी हम सरपंच प्रतिनिधि और मंत्री को इन समस्याओं के बारे में बतातीं हैं, तो वे हर बार एक ही बात बोलकर पल्ला झाड़ लेते है कि ये बस्ती तो बामनपुरी पंचायत में है ही नहीं, वो जगह तो वीरान है।


महिलाओं की बातें सुनकर एस.डी.एम. महोदय ने सरपंच प्रतिनिधि को फोन लगाकर तुरंत जनपद कार्यालय पहुंचने को कहा। फिर वे महिलाओं से बोले ”इस आवेदन को टाइप करवाकर लाइए। एक प्रति यहाँ मुझे और दूसरी प्रति तहसीलदार साहब को देना होगा। बाकि की दो प्रतियों में से एक को कलेक्टर महोदय के नाम और दूसरी मुख्यमंत्री जी के नाम से डाक द्वारा भोपाल भेजवानी होगी।” सलीता दीदी और दो भइया आवेदन की प्रति बनवाने गए।


बाकि दीदियाँ और भइया इंतजार करने लगे। एस.डी.एम. महोदय और उनका मोबाइल अब किसी दूसरे गाँव की समस्या सुलझाने में लग गए। एक-डेढ़ घण्टे बाद सरपंच प्रतिनिधि घबराया हुआ वहाँ पहुंचा। “जब इन लोगों का राशन कार्ड, आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र सब कुछ है, फिर इन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ क्यों नहीं दिलाते? दस्तावेजों में गाँव आबाद होता रहेगा, इनको लाभ तो मिलना चाहिए।” एस.डी.एम. महोदय ने सबके सामने सरपंच प्रतिनिधि को फटकार लगाते हुए कहा। सरपंच प्रतिनिधि सर झुकाए सारी बातें सुनता रहा।


एस.डी.एम. महोदय ने, सरकारी दस्तावेजों में गाँव आबाद करवाने का आश्वासन दिया। बस्ती में रोड बनेगा, पहचान मिल पायेगी, इस विश्वास से महिलाएँ और पुरूष बस्ती लौट आए।


अगली ग्रामसभा में बस्ती की महिलाएँ जब पहुंची तो सरपंच प्रतिनिधि ने इन्हें बैठने के लिए कहा और अपनी बात रखने के लिए मौका भी दिया। महिलाओं ने बस्ती में शौचालय और रोड बनाने के लिए फिर से मुद्दा उठाया।


बस्ती में कुछ लोग आकर बड़ा सा लोहे का स्केल और टेप की मदद से कच्चे रोड की नपती करने में लग गए। पिछले दस सालों में ऐसी न जाने कितनी ही नपतीयां हुई पर रोड क्या उसके नाम पर एक छोटा सा पत्थर तक बस्ती में नहीं पहुंचा।


कुछ दिनों बाद बस्ती में एक से दो डंपर गिट्टी खाली हुई। इस बार लगता है सच में रोड बनने जा रहा है। करीब एक हफ्ते बाद बस्ती में जे.सी.बी. मशीन से खुदाई चालू हो गई। मिक्सर मशीन आने में 15-20 दिन लगा आखिरकार 100 मीटर रोड एक महीने में बनकर तैयार हो ही गया।


आवेदन देने के छः महीने पूरे होते-होते शौचालय बनाने के लिए लिस्ट में लोगों के नाम आना शुरू हो गए। सरकार द्वारा दी जाने वाली 12 हजार रूपये की राशि में शौचालय बनाना मुश्किल था। महिलाओं ने अपने बचत समूह से शौचालय बनवाने के लिए लोन लिए। लोन और सरकार द्वारा मिलने वाली राशि से मजबूत और सुंदर शौचालय बनवाए। आज इन्हें अपने नाम पर आवास योजना के अंतर्गत घर बनाने के लिए पैसे आने का इंतजार है।


सरकारी योजनाओं से कई सुविधाएं मिलने से इन लोगों को लगता है, कि इनकी बस्ती आबाद हो गई। लेकिन सरकारी दस्तावेजों में अब भी यह बस्ती वीरान है। उम्मीद है कि, 2021 की जनगणना शायद इस बस्ती को आबाद कर पाए।

 

Research: Roshani Chouhan

Story writers: Roshni Chouhan, Sandip Bhati, Jyoti Garhewal Lasar

Mentor & Guide: Pinky Brahma Choudhury

Sound recording: Rabindra Kumar Barik

Sound design: Varsha Ransore, Roshani Chouhan, Aajad Singh Khichi

Sound Mixing: Pradeep Lekhwar

Art Work: Varsha Ransore

Page Design: Yathi kiran




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