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गौरा



नोट - पॉडकास्ट सुनने के लिए कृपया नीचे त्रिकोण (▶) को दबाये|


Research: Varsha Ransore

Story writers: Varsha Ransore, Aajad Singh Khichi, Sandip Bhati

Sound Recording: Rabindra Kumar Barik and Sandip Bhati

Sound Design: Varsha Ransore and Roshani Chouhan

Sound Mixing: Iqbal Hussain and Pradeep Lekhwar

Drawing: Maya Janine

Mentor & Guide: Pinky Brahma Choudhury




बचपन में जब भी मेरी उम्र के बच्चे खेलते-कूदते थे। मैं उनके साथ खेलने के बजाय अपने घर के आँगन की बेदी पर बैठी उन्हें देखती रहती थी। एक पैर को आधा मोड़कर दूसरे पैर से पत्थर के टुकड़े को पंजे से खिसकाकर जमीन पर बनी हुई लकीर के इस पार से उस पार पहुंचाते थे। पउवा खेल का ये नजारा देखकर, मुझे मम्मी की बताई हुई पुरानी बातें याद आ जाती हैं। जब मेरी उम्र महज तीन साल की थी, तब तक मैं भी अपने भाइयों और बहनों के पीछे दौड़ा कऱती थी।


हमेशा की तरह पापा शाम के समय घर आए, उन्हें देख मेरी बड़ी बहन मुझे अपनी गोद में लिए बाहर दरवाजे की तरफ भागी। अचानक ठोकर लगने से मैं अपनी बहन के हाथों से छूटकर दरवाजे की डेली पर जा गिरी। इससे मेरी कमर की हड्डी ऊपर की ओर खिसक गई। मम्मी बताती हैं कि उस दिन के बाद से 5-6 सालों तक खटिया पर ही लेटी रही, जिस वजह से अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाई। आज मैं अपने दोनों हाथों के सहारे चलती हूँ।


समय गुजरता गया और हम भाई-बहन बड़े हो गये। वे सभी अपनी-अपनी जिंदगी संभालने लगे और उसी में बिजी होते चले गए। मुझे घर के अकेलेपन से अंदर ही अंदर घुटन होने लगी। क्या जिंदगी भर मुझे माँ-बाप ही पालते रहेंगे? आखिर कब तक ऐसे ही उन पर बोझ बनकर बैठी रहूंगी? जिस दिन वे नहीं रहेंगे मैं किसके सहारे रहूंगी?


हाथों से चलने के कारण बाजार, नुक्ते, मान, और शादी-ब्याव में सभी लोग मुझे अपने साथ ले जाने में कतराते थे। इसलिए सिर्फ मेरा काम अंग्रेजी कवेलू के दो कमरे और एक खुले आँगन की चौकीदारी करना ही रह गया था। एक दिन, मेरे बड़े भाई-भाभी उदयनगर बाजार जा रहे थे। घर रहकर ऊब गई थी और मुझे अपना ब्लाउज भी सिलवाना था, तो उनके साथ बाजार जाने के लिए मैं जिद पर अड़ गई। बड़ी मुश्किल के बाद भाभी मानी। बैलगाड़ी पर पहली बार बैठकर जब घर से बाहर निकली, तो मेरी नजर एक जगह टिक ही नहीं रही थी। कभी नजर मिट्टी से बने सुंदर घरों पर जाती, तो कभी खाली खेतों से होते हुए दूर पहाड़ियों पर। रास्ते में पेड़ों पर लगे पलास के फूल देखकर पलक झपकाने को भी मन नहीं कर रहा था। भैया भाभी मुझे मेरी सहेलियों और रिश्तेदारों के घर भी दिखाते गए। मेरे मन में ख्याल आया कि मुझे कभी और इस तरह घर से बाहर निकलने का मोका मिलेगा?


हम उदयनगर पहुँच गये, भैया ने बैलगाड़ी टैलर की दुकान के सामने रोक दी। मैंने झोले में से चप्पल निकाल कर हाथों में पहन ली। बैलगाड़ी से जमीन पर दोनों हाथों के सहारे चलते हुए, दुकान की पैड़ी तक पहुँच गई। टैलर और आसपास के लोग मुझे ही देख रहे थे। मैं दुकान में रखी एक कुर्सी पर चढकर बैठ गई। आज लोगों की नजर मुझे लाचारी का अहसास करा रही थी। शायद इसी डर से ही मुझे बाहर लेकर नहीं जाते हैं।

मैंने झोले में से ब्लाउज का कपड़ा निकालकर, सामने वाली टेबल पर रख दिया। कैची को टेबल पर रख टेलर ने गले से टेप निकाली और मेरा नाप लिया। नपती के नंबर लिखकर नाम पूछा।

“गौरा“ मैं दबी सी अवाज में बोली।

“गांव का नाम?“

“नहारियापुरा“


टेलर ने ब्लाउज का कपड़ा टेबल पर बिछा दिया और जगह-जगह चॉक से निशान लगाने लगा। मेरी नजर उसके हाथों पर थी, जिधर-जिधर हाथ जाते मेरी नजर उनका पीछा करती। देखते ही देखते टेलर ने कैंची से कपड़े को 9-10 भागों में बाट दिया। मशीन में धागा बिठाया और कपड़े के अलग-अलग भागों को जोड़ने लगा। थोड़ी ही देर में ब्लाउज बनाकर तैयार कर दिया और मेरे हाथ में थमाया। मैंने ब्लाउज को अच्छी तरह देखा, मुझे लगा ऐसा तो मैं बना सकती हूँ।


कुछ देर बाद भइया-भाभी आ गये, हम वापस घर के लिए रवाना हुए। उस दिन घर से बाहर की शाम पहली बार मुझे अच्छी लग रही थी। अब मेरी नजर न तो खेतों पर थी, न आसपास के पेड़ों पर, मैं रास्ते भर भाभी को बताती रही, “भाभी ब्लाउज सिलना बहुत ही सरल है, उस टेलर ने तो झट से कपडे़ को काटा और सिल दिया। मेरा भी मन कर रहा है, मैं तो सिलूंगी।“

“पर तुम मशीन कैसे चलाओगी ? अपने घर तो मशीन है ही नहीं“ भाभी ने मेरी बात काटते हुए कहा।

“कुछ भी हो, मैं तो हाथ से ही सिलूंगी, तुम मुझे एक कपड़ा दे देना।“

हम उदयनगर से घर पहुंच गए। आज तो बाहर खेल रहे बच्चों पर भी ध्यान नहीं गया। बस कानों में कैंची और मशीन की आवाजें ही चल रही थी।

“काटोगी कैसे, घर में तो कैंची है ही नहीं।“ दूसरे दिन भाभी ब्लाउज का कपड़ा देते हुए बोलीं।

“कैंची नहीं है तो क्या हुआ, दराता तो है।“ मैं चौके में जाते हुए बोली।


पुराने ब्लाउज की सिलाई खोलकर हर एक भाग को नए कपड़े पर बिछाया। कोयले से कपड़े पर निशान लगाकर, दराते से एक-एक भाग को काटने में मुझे तीन दिन लग गए। मैंने ठान लिया था ब्लाउज तो सिलकर रहूंगी। घर में पतला धागा नहीं था, इसलिए गोदड़ी सिलने के मोटे धागे से ब्लाउज के एक-एक भाग को सिलना शुरू कर दिया। पहले एक साइड का कंधा और टुक्की जोड़ी, जो मुझे सरल और अच्छा लगा। मैंने सात दिनों में पूरा ब्लाउज तैयार कर लिया। इतने ध्यान और बारीकी से सिलने के बाद भी ब्लाउज बड़ा सिला गया, मैं उसे नहीं पहन पायी। लेकिन अपने आप पर विश्वाश हुआ कि मैं ये सीख गई तो खुद के लिए तो कमा ही लूंगी। अब मैं घर पर फ्री नहीं रहकर, फटे कपड़े और ब्लाउज सिलने में लगी रहती।


कुछ दिनों बाद मेरी बड़ी बहन ससुराल से घर आयी। मैंने जो ब्लाउज सिला था वो उन्हें दिखाया, उन्होंने पहना तो फिट बैठ गया। मैं खुश हो गई कि मेरे हाथ से सिला ब्लाउज आज मेरी बहन ने पहना है। बहन ने कहा कि “तू पास के रामपुरा गाँव जाकर सिलाई क्यों नहीं सिख जाती।“ ये सुनकर मेरी सिलाई सीखने की इच्छा और बढ़ने लगी। ”तुम मेरे लिए सिलाई की बात करके आना“ मैंने बहन से कहा।


अगले ही दिन बहन मेरे लिए, रामपुरा में सिलाई सीखने की बात करके आई। “सिलाई सिखाने वाली 500 रूपये महीना लेगी।” बहन की बातें सुनकर मुझे मम्मी पापा की मजदूरी का ख्याल आया कि वे महीने में 500 रूपये दे पायेंगे? इसलिए उनसे पैसे मांगने की हिम्मत भी नहीं हुई। रात को मन में भाभी की ही बातें चल रही थीं! सिलाई सीख भी लोगी तो फिर मशीन कहां से लायेंगे, उसे कैसे चलाओगी, आने-जाने की भी दिक्कत, इन सारी बातों से मेरी उम्मीद टूटती जा रही थी।


एक दिन दोपहर में रातातलाई से मेरे जीजाजी घर आये। मुझे देखकर वे बोले “गौरा तू उदास दिख रही है।“ तभी मेरी बहन बोल पड़ी “इसे सिलाई सीखना है, लेकिन सिखाने वाली पैसे ज्यादा मांग रही है।“ तब जीजाजी ने कहा “मेरे गांव से चार-पांच लडकियाँ नीमखेड़ा गांव के पास एक सिलाई भवन है, वहां जाती है।

“वहां कितने पैसे लेते है“

“वो लड़कियाँ बता रहीं थी वहां फ्री में सिखाते हैं।“

जैसे ही मैंने ”फ्री“ सुना तो मेरी उम्मीद फिर बंध गई। जीजाजी चाय पीकर घर चले गए। मैं मम्मी-पापा का खेत से वापस आने का इंतजार करने लगी कि कब वे आएं और उन्हें यह बात बताऊं।


मम्मी पापा आते ही मैंने बताया कि नीमखेड़ा में फ्री में सिलाई सिखाते हैं। पापा, भाई तो तुरंत ही मना कर गये और मम्मी बोल पड़ी “बस से जायेगी तो कौन उतारेगा कौन चढ़ायेगा? तू हाथ से चले और रस्ते में कुत्ते ने काट़ लिया तो पता ही नहीं चलेगा, तू तो रहने दे, घर ही बैठ।”

”तुम हो, जब तक साथ दोगे, जिस दिन तुम नहीं रहे, उस दिन मैं क्या करूंगी? कब तक घर में बैठी रहूंगी।“ मैं उनकी बात को नकारते हुए बोली।


बहुत समझाने के बाद आखिर मम्मी पापा मान गए। लेकिन उनके चेहरे पर मेरे लिए चिंता साफ दिख रही थी।

मेरे मन में एक ही बात चल रही थी, नीमखेड़ा जायें कैसे? नहारियापुरा से नीमखेड़ा तक जाने का 5 रूपये किराया था। मेरे और भाई के आने-जाने के लिए 20 रूपये की व्यवस्था करनी थी। मम्मी-पापा धाड़की-मजदूरी करके जो कमाते थे उतने में सिर्फ घर का गुजारा ही होता था। वे मुझे रोज-रोज पैसे कैसे देंगे?


तभी याद आया कि, राखी के शगुन में बहन और जीजाजी ने मुझे एक मुर्गी दी थी। उन्होंने बोला था, इसे बेचकर चुड़ी पहन लेना। 60 रूपये में मुर्गी बेचकर कुछ पैसों से मैंने चूडियां पहनीं और जरूरत के हिसाब से सामान खरीद लिया था। उनमें से 10 रू बचे थे, अब 10 रूपये की व्यवस्था और करनी थी। सुबह मैंने

मम्मी-पापा से बाकी के 10 रूपये मांगे। मैं और मेरा भाई घर से नीमखेड़ा के लिए निकल गए। घर से मैन रोड़ डेढ़ किलोमीटर दूर था। रास्ता कच्चा था, उसमें भी एक नाला पार करना पड़ता था। मैं घर से तो निकल गई, लेकिन इस डेढ़ किलोमीटर के सफर में मुझे 7 से 8 बार रास्तें पर आराम करने के लिए बैठना पड़ा।


हम मेन रोड पहुंचकर बस का इंतजार करने लगे। बस जैसे ही रूकी, भाई ने मुझे गोद में उठाया और सीट पर बैठा दिया। बस ड्राइवर ने हमें नीमखेड़ा फाटे पर उतार दिया। वहाँ खडे़ लोगों से पूछने पर पता चला, सिलाई भवन तो करीब 300 मीटर पीछे रह गया है। मेरा भाई आगे-आगे चला और मैं थोड़ी दूर चलूं और बैठ जाऊं। कड़कती धूप में मेरे घुटने जलने लगे और मैं पसीने में तर बतर हो गई। जैसे-तैसे करके हम सिलाई भवन पहुँचे। भवन के दरवाजे पर ताला लगा देख माथे पर सल आ गये। भाई ने बोला, कोई बात नहीं, कल फिर आ जायेंगे। मन तो उदास था ही, लेकिन भाई की बात से फिर आश बंध गई।


अगले दिन किराये के पैसों की व्यवस्था भाई ने इधर-उधर से मांगकर कर ली। इस बार सिलाई भवन के ठीक सामने ही बस रूकवाई। मेरा भाई भवन के दरवाजे पर खड़ा हो गया और मैं अन्दर चली गई। दोनों तरफ मशीनों की लंबी कतार के बीच, एक सकड़ी गली थी। वहां महिलाओं और लडकियों के अलावा कुछ भैया लोग भी सिलाई कर रहे थे। सभी लोग बड़ी हैरानी से मुझे देखने लगे। तभी सामने से पुष्पा दीदी और पप्पू भइया मेरे पास आए और पूछा “ दीदी आप कहाँ से आए हो और क्या नाम है ?

मैंने कहा “नहारियापुरा से, मेरा नाम गौरा है”

“तुम सिलाई सीखना चाहती हो?“

मैंने झट से हाँ भर दी।

दीदी भइया ने मुझे कुर्सी पर बैठाकर कहा “अभी तुम देखो, कैसे सिलाई होती है”


मैंने 2 घंटे बैठकर देखा कुछ महिलाएं कुर्ते सिल रही थीं, उधर पुष्पा दीदी लडकियों को समझा रहीं थीं कि कैसे सिलते हैं, और पप्पू भइया बड़ी सी टेबल पर कपड़ा काट रहे थे। सभी को मिलजुलकर काम करते देख मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मेरी नजर एक महिला पर पड़ी, जो रंग बिरंगे कपड़े के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़ रही थी, जो देखने में सुंदर लग रहे थे।

पुष्पा दीदी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा “तुम कल भी आओंगी”

“हाँ दीदी ” मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया।


हम लोग घर आ गये, उस दिन मेरी खुशी का ठिकाना न था। अगले दिन मम्मी ने बस किराये के पैसे

इधर-उधर से लाकर मुझे दे दिए। मैं अकेली ही घर से निकल गई। रास्ते में सहेलियां मुझे देखकर पूछ रही थी “गौरा, कहाँ जा रही है?” मैंने उत्साह से जवाब दिया “सिलाई सीखने।” मेन रोड़ पहुंच कर बस का इंतजार करने लगी। बस आई पर हाथ देने के बाद भी नहीं रूकी। 1 घण्टे इंतजार करने के बाद दूर से बस आते देख, मैं रोड़ के ऊपर थोड़ा आगे आई और हाथ दिया, इस बार बस रूक गई।


भवन में जैसे ही पहुंची, सभी ने मुझे नमस्ते किया, मैंने भी नमस्ते बोला। पुष्पा दीदी और पप्पू भइया ने बताया कि सिलाई करने के लिए सबसे जरूरी कपडे़ का नाप लेना होता है।

“तुम्हें गिनती आती है?” पप्पू भइया ने मुझसे पूछा।

”गिनती तो नहीं आती लेकिन पैसे 5,10,20, करके गिन लेती हूँ।“

“कोई बात नहीं, हम सिखा देंगे“


टेप पर लिखे सारे नंबर के बारे में पुष्पा दीदी ने मुझे बताया, और उन्हें देखकर लिखने को भी कहा। मैं दिन भर टेप पर लिखी हुई गिनती लिखती रही। उन दिनों, मेरे साथ कुम्बाया भवन में कम से कम 20 से 25 लडकियाँ और कुछ महिलाएँ भी सिलाई सीखने आ रही थी। उनसे बातचीत करना और साथ में बैठकर टिफिन खाना, इससे अपनापन महसूस हो रहा था।

”दीदी, कल शायद ही आऊं“ मैंने हिचकिचाते हुए, पुष्पा दीदी से कहा।

“क्यों?”

“दीदी, किराये के पैसे नहीं है” मैंने नजर झुकाते हुए कहा।

”इसमें नहीं आने वाली बात कौनसी है, हम कुम्बाया में सभी को बस किराया देते है।” दीदी ने मेरे हाथों में पैसे देकर कहा।


घर पर कंकर पत्थर की ढेरी बनाकर उसे गिना करती और पट्टी पर भी गिनती लिखती रहती थी। कुछ दिनों में टेप के नंबर पढना और लिखना सीख गई। उसके बाद कपड़े पर कैसे नाप लेते हैं और कैसे कैंची चलाते हैं यह सिखाया। शुरू-शुरू में जैसे ही कैंची हाथ में पकड़ी तो हाथ धूंजने लगे। कैंची कभी तिरछी जाती तो कभी हाथ से छूट ही जाती। कपड़ा काटते-काटते अक्सर कैंची में कपड़ा उलझ ही जाता था। सीधा कपड़ा काटने में कम से कम सात दिन लग गए। जहां सभी लोग पैर से मशीन चलाते थे, वहीं मेरी सीखने की लगन को देखकर, संस्थापक सदस्य निवे दीदी ने स्पेशल मेरे लिए, हाथ से चलने वाली मशीन मंगवायी।


मेरे हाथ उस पर सेट हो जाएं, इसलिए एक दो दिन तक खाली मशीन ही चलाई। जैसे फिर सभी को शुरूआत में सीधी पट्टियाँ जोड़ना सिखाते हैं वैसे मुझे भी सिखाया। शुरू-शुरू में हाथ से मषीन का हैण्ड़ल घुमाती तो पट्टियों पर सिलाई टेड़ी मेड़ी हो जाती और दूसरे हाथ से कपड़ा आगे खिसकाती तो हैण्ड़ल घुमाना भूल जाती। पट्टियों की टेड़ी मेड़ी सिलाई को सुई से वापस उधेड़ों और फिर सिलो। इस वजह से कई दिनों की कोषिष के बाद सीधी सिलाई आने लगी। अब मुझे विश्वाश होने लगा था कि मैं सिलाई सीख सकती हूँ।


सिलाई सीखने में आने वाली समस्या तो सुलझ गयी लेकिन बस से आने की समस्या ज्यों की त्यों थी। बस वाले वार त्यौहारों पर मुझे देखकर बस ही नहीं रोकते थे। बस वालों से पुष्पा दीदी ने बात की तभी से वे मुझे बिठाने लगे। धीरे-धीरे जान पहचान बढ़ने लगी फिर बस वाले चढा़ने-उतारने में मेरी मदद भी करने लगे।

एक दिन मैं हाथ वाली मशीन चलाते हुए, पांव से चलने वाली मोटर की मशीन देख रहीं थीं।

”मैं भी मोटर वाली मशीन चला सकती हूँ, शायद इसमें पांव से ज्यादा जोर नहीं देना पड़ता“ मैंने आत्मविश्वाश से पुष्पा दीदी से कहा।


दीदी ने मुझे मशीन पर बैठा दिया और मेरे पास खड़ी हो गई। मशीन पर बैठी तो पैर मशीन के पेरदान तक जाते-जाते बहुत काप रहे थे। पैरों में तो बिल्कुल जान नहीं थी, लेकिन जैसे ही मोटर के रेगुलेटर पर हल्के से पैर रखा, तो मशीन चलने लगी। मैंने खुश होकर दीदी को बताया कि मेरे पैर काम करने लग गये। दीदी अंचभित होकर सभी को बताने लगी, गौरा से मोटर वाली मशीन चल गई! सभी ने खूब तालियां बजाईं और उस दिन सभी लोग मेरी खुशी में शामिल हो गये।


मेरी इस पहल को देख पुष्पा दीदी ने यह खुशखबरी निवे दीदी को भी बताई। यह जानकर वे बहुत खुश हुए। उन्होंने मोटर वाली मशीन चलाने को कहा और मेरे लिए विशेष स्टूल भी बनवाया ताकि आसानी से उस पर बैठकर सिलाई कर सकूं। उस दिन घर जाने को मन बहुत बैताब था कि यह खुशखबरी मम्मी-पापा, भैया-भाभी सभी को बताऊं। जैसे ही घर पर बताया मेरी बातें सुनकर सभी खुश हुए और बोले तेरी मेहनत रंग लाई।


मोटर वाली मशीन चलाने में डर लगता था कि कहीं उंगलियों पर न चल जाए। पुष्पा दीदी और भी साथियों ने मोटर मशीन चलाते समय क्या-क्या सावधानी रखनी चाहिए, उसके बारे में बताया। निवे दीदी और भवन के सदस्यों की हमेशा यह सोच रहती थी। मेरे जैसे कई अक्षम लोगों की कमाई बराबर रहे, उसके लिए हमारी क्षमता अनुसार आइटम की डिजाइन तैयार की जाती थी। जैसे पाइनापल, त्रिकोण, चौकड़ी पेच, पेपर बेग, कुशन कवर और चादर भी सिलना सिखाया। जिससे हम दिन में कम समय में ज्यादा कमाई कर सकें। ये सब आसानी से सिल पाएं, इसके लिए पुष्पा दीदी और बिप्लव भैया ने हमें पेटर्न बनाकर भी दिए।


समय गुजरता गया, मैं सिलाई करने में माहिर होती गई। एक दिन अचानक मैं बीमार पड़ गई। शुरूवात में इलाज के लिए पापा ने सेठ से 500 रू. लिए थे। मेरी तबियत ठीक न होने पर पैसों की और जरूरत पड़ी। उस समय मैंने पापा को बोला “कुम्बाया भवन से पैसे ले आओ।” अगले ही दिन पापा सोयाबीन की फसल में चुकाने का बोलकर 2000 रूपये पुष्पा दीदी से ले आए।

तबियत ठीक होने के बाद मैं वापस सिलाई करने जाने लगी, उस महीने मेरी टोटल कमाई 2200 रूपये हुई। ”मैंने 2000 रूपये पुष्पा दीदी को दे दिए है“ पापा के हाथों में 200 रूपये देकर बोली।

“गोरा तुने मुझे कर्जा चुकाने का मौका तक नहीं दिया“ प्यार से मेरे माथे पर हाथ फेरकर पापा ने बोला और उनकी आंखें भर आईं।


आज मुझे कुम्बाया में 16 साल हो गए और मैं प्रोडयूसर होने के साथ-साथ कुम्बाया प्रोडयूसर कंपनी लिमिटेड की शेयर होल्डर हूँ। रंग बिरंगे कपड़ों के छोटे-छोटे टुकडों को जोड़कर एक चादर बनाती हूँ, जिसे पैचवर्क कहते हैं, जो कुम्बाया की खास पहचान है।


पहले मुझे कोई अपने साथ नहीं ले जाता था पर कुम्बाया में मुझे नए दोस्त मिले है। शादी, मान और नुक्ते में कोई भी जाता है तो वे मुझे अपने साथ लेकर जरूर जाते हैं। घर से दूर मुझे भोपाल जाने का भी मौका मिला।

बारिश के मौसम में घुटने-घुटने बहते पानी के नाले को पार करके, कुम्बाया भवन जाना मेरे लिए मुमकिन ही नहीं। मेरी कमाई न रूके इसलिए कुम्बाया ने एक सिलाई मशीन घर पर ही दे दी। काम देने के लिए पुष्पा दीदी मेरे घर आती थीं, जो आइटम बनाने होते थे उनके बारे में वो समझाती थीं। दीदी को बार-बार आते देख, पापा और भाई भी भवन से काम लेकर आ जाते थे। घर से ही 3500 तो कभी 4000 रूपये तक की कमाई कर लेती हूँ।


कुम्बाया ने हमारे आदिवासी क्षेत्र की लडकियों, महिलाओं और मेरे जैसे लोगों को सिलाई सिखाकर, घर से बाहर निकलने का एक मोका दिया है। साथ ही हम जैसों के लिए कुम्बाया आमदनी का जरिया बनकर भी उभरा है।


लॉकडाउन के समय सारा काम-काज रूक गया था। हमारे घर से कोई भी मजदूरी करने नहीं जा पा रहा था। जिससे घर खर्च चलाने में काफी परेशानी आ रही थी। उस समय कुम्बाया ने किराना सामान दिया जिससे बहुत मदद मिली। हम सभी प्रोडूयसरों की आमदनी वापस चालू हो इसलिए घर पर ही हमें, पाइनापल पेच, पेपर बैग, नाड़ी और मास्क बनाने का काम भी दिया।


स्वयं का खर्च उठाकर, मम्मी पापा की मदद भी करती हूँ। कुम्बाया से जुडकर अब मैं किसी पर बोझ नहीं हूँ और खुद अपने पैरों पर खड़ी हूँ। भाई की बहू को सिलाई सिखाने का सोच रही हूँ।

 


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