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केसरपाटी

अपडेट करने की तारीख: 11 अक्तू॰ 2021



झिगड़ी ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाला केसरपाटी गाँव 20 घरों की बस्ती है। इस गाँव में चारण समुदाय के भूमिहीन परिवार रहते हैं। घर की छतों पर देसी खपरैल और मिट्टी की दीवारों पर बनी कई सुंदर आकृतियाँ इनकी जीवन शैली को दर्शाती हैं। इनका मुख्य व्यवसाय दूध बेचना है। पर दूध बेचकर जितनी आमदनी होनी चाहिए, वह नहीं हो पाती है। इस गाँव का सबसे नजदीकी शहर बड़वाह है, जो नर्मदा तट पर बसा हुआ है। यहाँ अनाज, सब्जी और कपास मंडी होने से यह आसपास के गाँवों का व्यापारिक केन्द्र भी है। संसाधनों के अभाव के कारण केसरपाटी गाँव के लोग अपने गाँव से 25 किलोमीटर दूर इस बड़वाह शहर तक दूध नहीं पहुँचा पाते हैं। इस कारण गाँव में ही बाहरी व्यापारियों को बाजार भाव से सात रूपये कम दाम पर दूध बेचने पर मजबूर होना पड़ता है।



समाज प्रगति सहयोग संस्था ने केसरपाटी गाँव में स्वयं सहायता समूह कार्यक्रम की शुरूआत की। गाँव की महिलाओं को लगा कि इस कार्यक्रम से जुड़ने पर उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा और 2016 में 11 महिलाओं ने मौसम प्रगति समूह का गठन किया। समूह में महिलाएँ अपनी कमाई अनुसार बचत करने लगीं। उसी के माध्यम से महिलाओं का बैंक से जुड़ाव हो पाया और बचत के आधार पर इन्हें बैंक से ऋण मिलने लगा। मौसम प्रगति समूह जैसे 20 समूहों से मिलकर लखनपुरा प्रगति संकुल बना है। संकुल बैठक में महिलाएँ सामाजिक मुद्दे, सरकारी योजनाओं और गाँव की समस्याओं पर खुलकर बात करतीं हैं। संकुल मीटिंग से प्रेरित होकर केसरपाटी की महिलाओं ने समूह की मीटिंग में अपनी बात रखने का निर्णय लिया और गाँव की बिजली समस्या के बारे में समूह संचालक आशा दीदी को बताया। "गाँव में घरेलू बिजली कनेक्शन नहीं है। सिर्फ खेती की सिंचाई वाली बिजली का कनेक्शन है, जो दिन के छः घंटे और रात के चार घंटे। उसमें भी घरेलू कामकाज के समय अक्सर गुल ही रहती है। इसका भी समय हर 15 दिन में बदलता रहता है। हम गाँववाले तो बहुत परेशान हो गए हैं।"   नांगल दीदी जो एक पैर से अपंग हैं और जिनको रात के अंधेरे में ठीक से दिखाई भी नहीं पड़ता, उनके पति ने मजाक में बताया, "इस पगली ने तो कई बार खाना बनाते समय कपड़े तक जला लिये।" जानकी दीदी ने कहा, "मच्छर आखी रात सोने नहीं देते, बच्चे कई बार नींद में उठकर बैठ जाते हैं। दो साल पहले गाँव के लोग डेंगू, चिकन गुनिया से बीमार पड़ गए थे।" रतना दीदी ने बताया, "बच्चे चिमनी में ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाते हैं और धुएँ से पूरा घर काला पड़ जाता है। राशन कार्ड पर मिलने वाले 2 लीटर कैरोसीन को 30 दिन तक चलाना मुश्किल है। इसी वजह से हमें खाने के तेल से दीपक जलाना पड़ता है, जितना तेल खाते नहीं, उससे कई ज्यादा दीपक में जला देतें हैं।"   मालू दीदी ने बताया, "रात में ढोर, भैंस को चारा-पूला डालते टेम, मन में डर लगा रहता है कि कहीं जिन-जिनवर नी काट ले और दूध निकालते बखत अगर लाइट नी हो तो कई बार दूध बाल्टी के बजाये नीचे ही गिर जाता है।"

बाकी के समूह सदस्यों ने बताया कि बिजली की समस्या को लेकर गाँव के लोगों ने कई बार झिगड़ी ग्राम पंचायत और बलवाड़ा बिजली विभाग के भी चक्कर लगाये। उन्हें हर बार वहाँ से यही दिलासा देकर वापस भेज दिया गया कि 15 दिन में बिजली आ जायेगी। इसी तरह दिन सप्ताह में बीते, सप्ताह महीनों में बीते और महीने 2 सालों में बीत गये, पर गाँव में बिजली की चमक अभी तक नहीं आई। सभी महिलाओं की बातें सुनकर आशा दीदी ने कहा, "गाँव की कोई भी समस्या हो, तो आपको ग्राम सभा में जाकर अपनी बात रखने का अधिकार है। बिजली की समस्या का समाधान पंचायत के जरिये किया जा सकता है।" आशा दीदी ने आवेदन तैयार किया जिसे 15 अगस्त 2018 को झिगडी पंचायत की ग्राम सभा में मालुबाई, हीरूबाई, देवीबाई, रत्नाबाई, अर्चनाबाई, जालुबाई और जानकीबाई द्वारा दिया गया। आवेदन पढ़कर संरपच और मंत्री ने कहा, "ये काम हमारा नहीं है, इसके लिए बलवाड़ा बिजली विभाग जाओ।" उनकी बात का उत्तर देते हुए रत्नाबाई ने कहा, "अभी आप बिजली विभाग जाने का बोल रहे हो पर चुनाव के समय आपने ही बोला था कि गाँव की हर समस्या का समाधान करेंगे। आप ही तो हमारे प्रतिनिधि हैं और आप ही ऐसा बोल रहे हैं। बिजली को लेकर हम बहुत परेशान हो चुके हैं। आप हमारी समस्या का समाधान जल्दी कीजिए।" तभी समूह की अध्यक्षा मालू दीदी और सभी महिलाओं ने एक आवाज में जोर देते हुए कहा, "अगर हमारी समस्या सुनी नहीं गई, तो हम बड़वाह तहसील तक जाएँगे।" संरपच और मंत्री घबरा गए। इन्होंने दीदियों से कहा, "हाँ, हाँ ठीक है, करवा देंगे।" इनकी बात पर दीदियों को बिल्कुल भी भरोसा नहीं हुआ क्योंकि गाँव के भइया लोग भी पिछले दो सालो से बिजली की समस्या को लेकर भटक रहे थे। दीदीयों के मन में डर था कि कहीं उनको भी झूठा आश्वासन तो नहीं दे रहे। "बिजली नहीं तो बोट नहीं", सब एकसाथ बोल उठीं। इनके गुस्से को देख, संरपच ने पंचायत मंत्री (सचिव) से बिजली विभाग बलवाड़ा को तुरंत फोन लगाने को कहा। "केसरपाटी गाँव से घरेलू 24 घण्टे वाली बिजली कनेक्शन के लिये आवेदन आया है। यह समूह की महिलाओं का मामला है, इसके लिए क्या कार्यवाही कर सकते हैं, आप हमें बताएँ।" बिजली विभाग से बात करने के बाद सरपंच और मंत्री जी ने महिलाओं को विश्वास दिलाते हुए कहा, "आपके गाँव में जल्द से जल्द बिजली कनेक्शन करवाने की कोशिश करेंगे।"



एक दिन गाँव में खंबों से भरी हुई गाड़ी पहुँची। इसे देख गाँव में हलचल मच गई। बच्चे गाड़ी के पीछे दौड़ने लगे, महिलाएँ दरवाजे पर खड़ी होकर यह नजारा देखने लगीं। वहीं पुरूष, खंबे उतरवाने में मदद करने लगे और बुजुर्गो ने राहत की साँस लेते हुए कहा, "चलो, बिजली आ ही जाएगी।" समूह के इस संगठित प्रयास के आगे बिजली विभाग को आखिरकार सिंतबर 2018 में बिजली कनेक्शन देना ही पड़ा। दो किलोमीटर दूर पाला पलासिया गाँव से 35 खंबों की लाइन डालकर इसके लिये अलग से डीपी (ट्रांसफार्मर) की व्यवस्था की गई। केसरपाटी गाँव पहले चाँदनी रात में भी काले साये में रहता था, आज वो बिजली की चकाचैंध से जगमगा रहा है। जो महिलाएँ कभी समूह की मीटिंग में अपनी बात रखने में हिचकिचाती थीं, आज वहीं महिलाएँ ग्राम सभा में जाकर अपने गाँव के सार्वजनिक मुद्दों पर खुलकर अपनी आवाज उठाती हैं। बिजली की समस्या हल करने के बाद इन महिलाओं ने 26 जनवरी, 2019 की ग्राम सभा में रोड बनवाने के लिए आवेदन दिया। इस नए मुद्दे के साथ इनका संघर्ष अब भी जारी है।


 

Researched, Written and Voiced by Roshni Chouhan

Story writers: Pradeep Lekhwar, Sandip Bhati, Iqbal Hussain, Laxminarayan Devda

Sound design: Milind Chhabra, Pradeep Lekhwar, Rabi Barik

Photo: Roshni Chouhan

Drawing: Maya Janine

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