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प्रमाण पत्र

  • लेखक की तस्वीर: SPS Community Media
    SPS Community Media
  • 13 अप्रैल
  • 10 मिनट पठन

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सारांश - पति की आकस्मक मृत्यु के बाद तानु ने पति का मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाना जरूरी ना समझा और फिर इन्हीं दस्तावेज का ना होना उसकी बेटी की पढ़ाई और उसके हक के बीच सबसे बड़ी अड़चन बन गए।


Research: Sangeeta Randhawa

Voice: Sana Salim, Sangeeta Randhawa, Roshani Chouhan, Krishna Randhawa, Varsha Ransore, Kamakshi Sharma, Nandani Garhewal, Nikita Bhusariya, Karan Bachania, Sandeep Bhati, Iqbal Hussain, Pradeep Lekhwar, Aajad Singh Khichi, Arvind Pratap

Art Design: Roshani Chouhan

Story Writers: Sangeeta Randhawa, Roshani Chouhan, Aajad Singh Khichi, Shaikh Sajid

Sound Recording: Aajad Singh Khichi

Sound Design: Sangeeta Randhawa, Aajad Singh Khichi

Sound Mixing: Pradeep Lekhwar

Mentor & Guide: Pinky Brahma Choudhury

Creative Support: Onsai Foundation

Financial Support: Azim Premji Foundation


कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

मंगू - पापा, पापा, मम्मी पापा का तो हाथ-पैर भी नी हिली रा,

तानु - उठो उठो उठो हे भगवान काई हुई गयो एक दम सी, अभी तो अच्छा था, उठो, उठा मंगू थार काका क अवाज लगा तो

मंगू- भादर काका दोड़ो जल्दी आओ, देखो पापा क काय हुई गयो, वो आंख भी नी खोली रिया।”

तानु - ले मंगू उठा तो उधर से

भादर काका - “कैलाश! जल्दी मोटरसाइकल निकाल, लो भाभी तुम माथा तरफ हाथ लगाओ, कैलाश गाड़ी और पास ला, भाभी तुम दूसरी गाड़ी से अई जाजो, हम इनकअ अस्पताल लिजइ रा।”


नरेशन - आज सुरेश को बागली अस्पताल में भर्ती हुए 4 दिन हो गए हैं। दोपहर का समय था, तानु और उनके पति सुरेश बातें कर रहे थे। बात करते-करते अचानक से सुरेश को घबराहट होने लगी।


तानु - “डॉक साहब, डॉक साहब जल्दी आओ, इनके जोर-जोर से सांस चली री है और खूब घबराई रिया है।“


नरेशन - तानु ने डॉक्टर को आवाज़ लगाते हुए कहा, फटा-फट डॉक्टर आए और चेक-अप शुरू कर दिए। एक इंजेक्शन लगाने के कुछ समय बाद जोर-जोर से चल रही सांसे थम गईं। तानु ने चिन्तित होकर पुछा


तानु - “क्या हुआ डॉक साहब ?“

डॉक्टर - “आपके साथ कौन है, उनको बुला लो और इनको घर ले जाने की तैयारी करो।“


नरेशन - डॉक्टर से इतना सुनने के बाद, तानु अपने पति के पास दौड़कर गई और उनसे लिपट कर जोर-जोर से रोने लगी । कुछ समय बाद उनके परिवार वाले अंतिम संस्कार के लिए सुरेश को अपने गांव डांगाडुंगी ले आए।


पति के जाने के दुःख के साथ-साथ उन पर चार बेटियों और एक बेटे के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी भी आ गई। जब उनके पति थे तो वे अपनी 1.5 बीघा सूखी खेती के साथ-साथ बांस के टोपले बनाकर आस-पास के गांवों में बेचा करते थे। सोयाबीन और गेहूं की कटाई के समय वे मालवा जाकर धाड़की, मज़दूरी भी किया करते थे, जिससे उनका घर चल जाता था । अब तानु रोज सुबह 6 बजे जंगल से अपने सिर पर लकड़ियों का गट्ठा लेकर 7-8 कि.मी दूर भीकुपूरा गांव की गलियों में घूम-घूम कर बेचने लगी। एक गट्ठा लगभग 40-50 रूपए में बेचकर भी घर चलाना मुश्किल हो रहा था।


उसने सोचा क्यों न वो लोगों के खेतों में मजदूरी करने जाए, क्योंकि उसकी बड़ी बेटी पारू अब 11 साल की हो गई है और पारू अपनी 8 महीने की सबसे छोटी बहन के साथ-साथ एक भाई और तीन बहनों का भी ध्यान रख लेगी। तानु का लोगों के खेतों में धाड़की, मजदूरी करने के बाद भी घर चलाना मुश्किल हो रहा था, क्योंकि अधिकतर पुरूषों के मुकाबले महिलाओं को कम मजदूरी मिलती है। पारू अपने भाई-बहनों को संभालती, पर आए दिन कोई न कोई रोने लग जाता था। उनके रोने की आवाज पड़ोस के स्कूल तक पहुँचती थी। स्कूल के मास्टर खिड़की से अक्सर पारू को बच्चों को चुप कराते हुए देखा करते थे।


एक दिन पारू अपने भाई बहनों को आंगनवाड़ी ले जा रही थी, तभी मास्टर ने पारू से पुछा।

मास्टर - “बेटा, तुम अकेली इन बच्चों को संभालती हो, आपकी मम्मी कहां चली जाती हैं ?“

पारू - “सर, धाड़की करने गई है।“


नरेशन - बच्चों को रोजाना इस तरह परेशान होते देख डांगाडुंगी के सरकारी स्कूल के मास्टर ने तानु को मध्यान भोजन बनाने का काम दिलवाया। अब तानु खाना बनाने के साथ-साथ अपने बच्चों का ध्यान भी रख लेती है। स्कूल से मिलने वाली तनख्वाह से उनके घर की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी। तानु स्कूल के रसोई घर में खाना बना रही थी, तभी हर दिन की तरह आंगनवाड़ी कार्यकर्ता निर्मला उनके पास आकर बातें करने लगी। बातों ही बातों में निर्मला ने तानु से पुछा:-


निर्मला - “भाभी, तुमको विधवा पेंशन मिलती है ?”

तानु - “नहीं तो, कौन सी पेंशन? मुझे तो कोई पेंशन नी मिलती।“

निर्मला - “आपके जैसी महिलाओं को सरकार द्वारा हर महीने विधवा पेंशन के 600रु दिए जाते हैं ।“

तानु - “अच्छा! तो दीदी मुझे भी दिलवादो ना। ”

निर्मला - ”ठीक है भाभी, बच्चों को खाना खिला दो, उसके बाद आप सारे कागज ले आना।“

 

नरेशन - तानु ने अपने सारे कागज निर्मला को दिखाये।


निर्मला - “भाभी, इसमें भैया का मृत्यु प्रमाण पत्र तो है ही नहीं।”

तानु - ”वो तो मुझे नी पता, जितने कागज थे, मैं सारे समेट लाई ।“

निर्मला - “इसमें तो केवल आधार कार्ड, वोटर आई डी, कूपन, जॉब कार्ड और इनकी फोटो कॉपियां ही हैं। विधवा पेंशन के लिए जो सबसे जरूरी कागज़ है वो तो है ही नहीं। नहीं बनवाया क्या ? भैया को तो गुजरे हुए ज़्यादा समय हो गया है।”

तानु - ”हां दीदी, वो कागज कहां से बनता है ? “

निर्मला - “रातातलाई पंचायत कार्यालय में सरपंच और सचिव से बात करना, वो बता देंगे कैसे बनेगा।”

तानु - ”दीदी, मैं तो कभी पंचायत कार्यालय में गई ही नी। वैसे भी रातातलाई हमारे गांव से दूर है और जंगल का रस्ता है, अकेली कैसी जाऊं?“

निर्मला - “गांव से कितने ही लोगों की तो मोटरसाईकिलें रातातलाई जाती रहती हैं, आप किसी के भी साथ चले जाना।“


नरेशन - निर्मला की ये बात सुनकर तानु कुछ सोचने लगी। थोड़ी देर बाद उदास होकर बोली ।


तानु - “दीदी, आपको तो पता ही है, लोग छोटी-छोटी बातों को राई का पहाड़ बना देते हैं। ऐसे में आप ही बताओ कि मैं रातातलाई किसके साथ जाऊं? मैं किसी आदमी से बात भी कर लूंगी तो लोगों को लगेगा कि उसी से मेरा चक्कर चल रहा है। वे सोचते कि मैं बच्चों को छोड़कर किसी दूसरे आदमी के साथ भाग जाउंगी, और भी न जाने कितनी मन-गढ़ंत कहानियां बनाते रहते हैं।


नरेशन - तानु की बात र्निमला को एकदम दिल पर लग गई। वे मन ही मन सोचने लगीं कि गांव में अकेली विधवा औरतों के लिए बाहर जाना कितना मुश्किल है। थोड़ी देर के लिए वह तानु को देखती रही। फिर समझाते हुए बोलीं।


निर्मला - “लोगों का मुंह तो बंद नहीं कर सकते भाभी, अगर सरकारी योजनाओं का लाभ लेना है, तो कागज़ बनवाना ही पड़ेगा।”

तानु- ”नहीं दीदी, मैं नहीं जा पाऊंगी, वहां जा के बदनाम होने से अच्छा है पेंशन जितना पैसा मैं मेहनत करके कमालूं ।“


नरेशन - इतना बोलकर तानु अपने घर की ओर चल दी। लोगों के ऐसे रवैए और तानों ने उसे इतना जकड़ लिया था कि वे चाहकर भी इनसे बाहर नहीं निकल पा रही थी। लगभग 9 सालों से वे समाज के इस बर्ताव को झेलती आ रही थीं। इन सालों में तानु की जिंदगी में कई दिक्कतें आईं, जिनका वे डटकर सामना करती रही। इसी बीच उन्होंने अपनी बड़ी बेटी पारू की शादी पठार गांव के रवि से करवा दी जो मोटरसाइकिल की गैराज में काम करता था। मंगु घर चलाने के लिए मां के साथ खेतों में मजदूरी करके हाथ बटाने लगा। जिसके चलते मंगु की पढ़ाई भी छूट गई।


तानु हमेशा से चाहती थी कि उसके बच्चे पढ़ें और अपने पैरों पर खड़े हो जाएं, जिन परेशानियों का सामना उसने किया है उसकी झलक भी उसके बच्चों को ना देखनी पड़े। परन्तु तानु की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि वो अपने सभी बच्चों की पढ़ाई का खर्चा स्वयं उठा सके। उसको डर था कि कहीं मंगू की तरह घर के कामों में उलझकर तारा की पढ़ाई भी न छूट जाए । इस डर से उसने तारा को अपने जेठ की बेटी के साथ पिपरी सरकारी छात्रावास में भर्ती करवा दिया। जहां तारा ने कक्षा 6 टी से 8 वीं तक निःशुल्क पढ़ाई की। पहली बार तानु के घर में किसी ने 8 वीं कक्षा पास की है, इसलिए वे बहुत खुश हैं । अब तानु चाहती है कि तारा 8 वीं के बाद की पढ़ाई भी उदयनगर सरकारी छात्रावास में रहकर पूरी करें।


तानु - “तारा, सारा कागज रख ल और जल्दी तैयार हुई जा, थारो जीजा जी लेण आतो ही होयग।“


नरेशन - उनकी बेटी तारा आज कक्षा 9 वीं में एडमिशन के लिए उदयनगर जा रही है। लगभग 10ः00 बजे तारा अपने जीजा जी के साथ उदयनगर छात्रावास में आवेदन करने के लिए निकल गई। मोटर साईकिल पर बैठी तारा मन ही मन कई रंगबिरंगे सुनहरे सपने बुनने लगी। अब उसे आगे निकलकर कुछ न कुछ बनना है । करीबन 11 बजे तारा छात्रावास पहुंच गई और अपने सारे कागज लेकर कार्यालय में गई ।”


तारा - “मैडम, मुझे छात्रावास के लिए आवेदन करना है।”

मैडम - ”ये लो फॉर्म, इसको भर दो और साथ में अपनी अंक-सूची, आधार कार्ड, समग्र आई डी, जाति और आय प्रमाण पत्र के साथ-साथ पापा के आधार कार्ड की फोटो कॉपी भी लगा देना ।”

तारा - “मैडम, फॉर्म भर दिया और आपने जितने कागज बताए थे सारे लगा दिए।“


नरेशन - मैडम ने तारा के एक-एक कागज देखे।


मैडम - “यहां ऊपर तुम्हारी और नीचे तुम्हारे पापा के साइन करवा लेना ।“


नरेशन - जैसे ही मैडम ने पापा के साइन का बोला, तारा का खिलखिलाता हुआ चेहरा मुरझाने लगा। वो उदास मन से बोली ।


तारा - ”मैडम, मेरे पापा तो शांत हो गए हैं।”

मैडम - ”ओ, तो फिर उनका मृत्यु प्रमाण पत्र लगा दो ।”

तारा - “वो तो मैं लाई ही नहीं।”

मैडम - “कोई बात नहीं 10 दिन के अन्दर जमा कर देना फिर हम तुम्हारा आवेदन आगे पहुंचा देंगे। बेटा, छात्रावास में सीटें लगभग भरने वाली हैं, पर तुम चिंता मत करो। अगर तुम समय पर पापा का मृत्यु प्रमाण पत्र जमा करवा दोगी, तो प्राथमिकता तुमको ही दी जाएगी और हां अगली बार मम्मी को साथ लाना। यहां पर उनका साइन लगेगा।“

तारा - “जी मैडम ।“


नरेशन - छात्रावास में आवेदन करने के बाद, तारा ने उदयनगर के सरकारी स्कूल में अपना दाखिला करवा लिया और घर के लिए रवाना हो गई। वो जैसे ही घर पर पहुंची, तानु मुस्कुराकर पूछने लगी।


तानु - “भर्ती हुई गई।“

तारा - “हां मम्मी, स्कूल म दाखिलो जमा हुई गयो, पर छात्रावास में मैडम ने पापा का मृत्यु प्रमाण पत्र मांगवायो है।”

तानु - ”वो तो मन बणवायो ही नी।“

तारा - ”मम्मी, मैडम ने 10 दिन को बोलियो है। अगर वो नी मिलीयो तो छात्रावास म म्हारो नाम नी आएगो।“

तानु - “अरे मक निर्मला दीदी ने बहुत बोलियो थो कि मृत्यु प्रमाण पत्र बणवय लो, पर मन उस समय बात टाल दी । हउ अब उनका सी बात करीन बणवालूंगी।”


नरेशन - अगले दिन ही सुबह तानु निर्मला के पास पहुंची और हड़बड़ाते हुए तारा के एडमिशन की स्थिति बताई।


तानु - ”दीदी, तारा को छात्रावास में नहीं रखा उदयनगर स्कूल कैसे जाएगी ? इतने पैसे भी नहीं है कि रोज बस के लिए किराया दे सकुं।“

निर्मला दीदी - “भाभी, मैंने पहले ही बोला था, कि बनवा लो, पर आपको तो अपने से ज़्यादा लोगों की पड़ी थी।“

तानु - “दीदी, तब बात पेंशन की थी। अब तारा के भविष्य का सवाल है।”

निर्मला दीदी - ”ठीक है भाभी, वो आरती दीदी अपनी आंगनवाड़ी में आती रहती हैं ना। मैं उनसे बात करूंगी, वो समाज प्रगति सहयोग संस्था में काम करती हैं। आधार कार्ड, पात्रता पर्ची, विधवा पेंशन और भी ऐसे कई कागज़ बनवाने में वो लोगों की मदद करती हैं।”


नरेशन - एक-दो दिन बाद आरती आंगनवाड़ी विजिट के लिए डांगाडुंगी में आईं। निर्मला ने तानु के पति के मृत्यु प्रमाण पत्र के बारे में आरती को बताया। उस समय तानु भी आंगनवाड़ी में बच्चों को खाना खिला रही थी। पूरी स्थिति जान लेने के बाद आरती ने तानु के घर जाकर पूरे कागज़ देखे। कागज़ देखकर आरती ने तानु से कहा:-


आरती - ”हम कल रातातलाई पंचायत कार्यालय में जाकर बात करेंगे।”


नरेशन - अगले दिन ही आरती के बोलने पर तानु मंगू के साथ पंचायत कार्यालय में गई। आरती ने पंचायत कार्यालय में सारे कागज सचिव को दे दिए। कागज़ देखकर सचिव बोला।


सचिव - “9 सालों से कहां गई थी बाई, जो अभी तक मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं बनवाया।”

आरती - “भैया, अब तो आ गई हैं ना, अब बना दो। इनकी बेटी के एडमिशन के लिए 4 दिन में देना है।

सचिव - ”अरे मैडम, गांव में अधिक्तर लोग सही समय पर अपने कागज़ नहीं बनवाते, और जब जरूरत पड़ती है तब हाय-तौबा करते हैं।”

आरती - ”मैं भी गांव में सभी को यही बात समझाती हूं, पर लोग ध्यान ही नहीं देते। लेकिन तानु दीदी की समस्या अलग है, आप बना दीजिए।”

सचिव - ”इनके पति की मृत्यु को 9 साल हो गए हैं, इसलिए वो यहां नहीं बनेगा, इनको बागली लोक सेवा कार्यालय में जाकर बनवाना पड़ेगा।“

तानु - “भैया, पर आंगनवाड़ी वाली दीदी ने तो बोला था कि यहीं से बनेगा ।”

सचिव - ”बाई, पंचायत में प्रमाण प्रत्र बनाने का नियम मृत्यु के बाद 21 दिन के अन्दर का ही होता है। मैं आपके पति के नाम का आवेदन बना देता हूं। आप जो भी वकील करो, उसको ये दे देना, वो बनवा देंगे।”


नरेशन - लगभग 11 बजे का समय था, आंगनवाड़ी में निर्मला अपने रजिस्टर में कुछ लिख रही थी। तानु खाना बनाने के लिए बच्चों की गिनती करने पहुंची और पंचायत में सचिव की बात बताने ही वाली थी कि उसी समय आरती भी वहां पहुंच गई। दोनों ने निर्मला को सारी बात बताई। उनकी बातें सुनकर निर्मला बोली:-


निर्मला - ”बागली कोर्ट में मेरी पहचान के एक वकील हैं, उनसे बात करके देखती हूं “


नरेशन - उसी समय र्निमला ने वकील को फोन लगाया और प्रमाण प्रत्र बनवाने के बारे में पूछा।


वकिल - “हां, बन जायेगा, 3000 रू लगेंगे, उनको सारे कागज लेकर बागली कोर्ट में भेज देना।”

तानु - ”इतने पैसे तो मेरे पास नी है, दीदी। वकील साहब से बात करके थोड़ा ऊपर-नीचे करवाओ नी।“


नरेशन - निर्मला ने तानु की स्थिति वकील को बताई, तो उन्होंने अपनी फीस 2000 रु. कर दी। दूसरे दिन ही तानु अपने बेटे मंगू के साथ मोटरसाइकिल पर बैठकर 25 कि.मी दूर बागली कोर्ट में वकील के पास पहुंच गईं, और सारे कागज़ दे दिए। कागज़ देखकर वकील बोले।


वकील साहब - “लो इस एफिडेविट पर साइन कर दो। और आपके साथ दो गवाह हैं क्या ? यहां उनकी भी साइन करवानी थी।”

तानु - “नहीं हैं ।”

वकील - ”ठीक है, मैं किसी और से करवालुंगा, आपका काम तो हो जायेगा।“

तानु - “वकील साहब, प्रमाण पत्र कितने दिन में बन जायेगा ?”

वकील - ”बाई, अभी तो कागज़ मेरे हाथ में ही हैं। यहां से लोक सेवा केन्द्र जाएगा, वहां से 10-15 दिन में आदेश जारी होगा, फिर तुम्हारी पंचायत में जायेगा, और इन सब में कम से कम एक महीना तो लगेगा ही।”

तानु - ”साहब, क्या जल्दी नहीं बन सकता ?“

वकील - “बाई, ये सरकारी काम है, कागज़ दस जगह घूमता है। एक महीने से पहले तो संभव नहीं है।”

तानु - ”एक-दो दिन में बन जाता तो मेरी बेटी का छात्रावास में एडमिशन हो जाता।“

वकील - ”बाई, अगर जल्दी ही चाहिए था, तो बनवाने में इतने साल क्यों लगा दिए?”


नरेशन - वकील की बात सुनकर तानु दुःखी हो गई। वह मन ही मन खुद को कोसने लगी, काश वे पहले ही प्रमाण पत्र बनवा लेती तो आज उसकी बेटी तारा को छात्रावास में प्रवेश मिल जाता। उसे अपने गांव से स्कूल आने-जाने में जो समस्या होती है उससे छुटकारा मिल जाता। साथ ही रहना, खाना-पीना और स्कूल के अलावा अलग से शिक्षकों द्वारा पढ़ाई की सुविधा भी मिलती।

छात्रावास में प्रवेश नहीं मिलने की वज़ह से, अपनी बुआ के घर, उदयनगर स्कूल के पास के गांव र्मिजापुर रहकर पढ़ाई की। लगभग एक महीने बाद तानु के पति का मृत्यु प्रमाण पत्र बन गया। और कुछ दिनों बाद तानु को हर महीने 600 रू विधवा पेंशन भी मिलने लगी, इससे वे तारा के किताब, कॉपी और स्कूल में लगने वाले छोटे-मोटे खर्चों को चला रही हैं। अब वे आने वाले साल में तारा का एडमिशन छात्रवास में करवाएगीं।




 
 
 

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